मूल्य परक शिक्षा, आज की जरूरत

डॉ. मोनू सिंह

बच्चे कच्चे घड़े है जिस माहौल मे ढाला जाएगा वो स्वतः ही ढल जायेंगे अक्सर बात होती है संस्कारो की ,संस्कृति,की, आदर्श मूल्य स्थापित करने की आखिर ये सब हैं कहाँ धरातल पर तो कतई नजर नही आते संस्कार आएंगें कहाँ से शिक्षा के बगैर तो जीवन वैसे ही निरर्थक है आखिर कहाँ हैं अधिकार इनके जिन्हें भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार प्राप्त है शिक्षा के कि बालक राष्ट्र के अमूल्य धरोहर है?
बाल केंद्रित शिक्षा में अध्यापक की भूमिका में आमूलचूल परिवर्तन आ गया है वर्तमान में तो कोरोना वैश्विक महामारी के कारण विद्यार्थी को अंतरजाल पर घर बैठे शिक्षा की वैकल्पिक व्यवस्था की गई है इसके लिए भी अध्यापक और अभिभावक दोनों ही प्रशंसा के पात्र हैं यद्यपि शिक्षा प्रदान करने में अध्यापक अपनी पूर्ण भूमिका निभा रहे तथापि वास्तविक शिक्षा विद्यालय शिक्षा के बिना अधूरी ही कही जा सकती है विद्यालय शिक्षा में विद्यालय का एकमात्र अपरिहार्य उपकरण शिक्षक है उच्च न्यायालय के एक निर्णय के अनुसार शिक्षक सरकारी कर्मचारी नहीं है यह तो भावी पीढ़ी का निर्माता है शिक्षक से बढ़कर समाज में किसी का स्थान नहीं है इसके अतिरिक्त कहा गया है कि शिक्षक को वेतन नहीं दिया जा सकता उन्हें जो दिया जाता है वह तो अनुदान हैं जब समाज शिक्षक को इतना सम्मान देता है तो अध्यापक का प्रथम कर्तव्य बन जाता है कि समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरे अध्यापक का चरित्र विद्यार्थियों और समाज के लोगों के लिए अनुकरणीय है अध्यापक विद्यालय का वैज्ञानिक है और कक्षाएं प्रयोगशाला है वह विद्यालय कक्षा में एकमात्र जीवित उपकरण है जिसमे मानवीय विरासत का कोई हिस्सा या पहलू जीवंत है उसके पास हस्तांतरण करने के लिए कुछ ऐसी चीज है जिसको हस्तांतरित करने में पारंगत है बच्चों को गुणवत्ता शिक्षा प्रदान करने के लिए अध्यापक कर्म हेतु कुछ मापदंडों को अपनाना होगा और आदर्श कार्य करने होंगे
योग्य और उत्साही एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की उपलब्धता अध्यापन को अपनी आजीविका के विकल्प के रूप में देखते हैं विद्यालयों के सभी वर्गों में गुणवत्ता शिक्षा के लिए एक आवश्यक शर्त है शिक्षा की कोई भी व्यवस्था अपने शिक्षकों की श्रेष्ठता से ऊपर नहीं उठ सकती और अध्यापकों की श्रेष्ठता उन्हें चुनने के साधन प्रशिक्षण प्रक्रिया और उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने के लिए प्रयुक्त मापदंडों पर निर्भर करती है पूर्व निर्धारित अध्यापकों की भर्ती प्रशिक्षण व सेवा शर्तों को हल्का करके अध्यापकों की नियुक्ति कर मानकों को हल्का करना बहुत ही चिंताजनक है जो गुणवत्ता शिक्षा के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह है आज किसी भी पद के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है परंतु जब भावी पीढ़ी के निर्माता शिक्षक के चयन की बात आती है तो सभी नियमों को ताक पर रखा जाता है अध्यापक जैसे पवित्र कर्म के लिए शैक्षणिक वरीयता के आधार पर चयन हो परंतु आज इसके विपरीत जो हो रहा है नहीं होना चाहिए
हमारे देश अथवा राज्य के राजकीय विद्यालयों का वातावरण एक जैसा नहीं है जैसे कई विद्यालय शहरों में है जहां अनेक प्रकार की सुविधाएं हैं तो कई विद्यालय दूर पिछडे क्षेत्रों में है जहां अभी तक भी मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़कों का निर्माण नहीं हुआ वहां तक पहुंचने के लिए पैदल चलकर जाना पड़ता है बालक के पाठ्यक्रम में जिन वस्तुओं स्थानों आदि का वर्णन होता है वह उससे अपरिचित होते हैं और कई बार उनको न समझते हुए भी याद करने के लिए बाध्य होना पड़ता हैं ऐसी अवस्था में विद्यार्थियों को गुणवत्ता शिक्षा प्रदान करने का पूरा उत्तरदायित्व सीधा अध्यापक पर है गांव देहात में एक कहावत है चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बानी वाली बात पूर्णरूपेण चरितार्थ होती है अलग-अलग राज्यों के लिए समय-समय पर अलग-अलग पाठ्यक्रम का निर्माण एवं समीक्षा होना जरूरी है लेकिन नहीं किया जाता तो यह अध्यापक की योग्यताओं पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार अपने परिवेश को दृष्टिगत रखते हुए पाठ्यक्रम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपने कार्य का निष्पादन करता है इसके लिए अध्यापकों का सुप्रशिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है समग्र शिक्षा अभियान के अंतर्गत अध्यापकों को दिए जा रहे प्रशिक्षण का प्रभाव विद्यार्थियों द्वारा ग्रहण किया जा रहा है शिक्षा स्पष्ट दृष्टिगोचर होनी चाहिए अब ये मात्र सूचना एकत्र करने वाले नहीं हो एवं ज्ञान समझ में बदलना जरूरी है तथा वे ज्ञान का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में भी करने लगे
एक प्रशिक्षित अध्यापक अपने विद्यालय के भवन यहां के सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण तथा बाल केंद्रित मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए एक शैक्षणिक वातावरण तैयार करने में सक्षम होना चाहिए जिससे छात्र स्वत: ही प्रतिदिन विद्यालय आने की हठ करने लगे न की विद्यालय के नाम से रोने लगे दूसरे शब्दों में विद्यालय विद्यार्थी के लिए आकर्षण का केंद्र होना चाहिए जिस प्रकार एक शिशु मां की गोद को छोड़ना नहीं चाहता उसी प्रकार छात्र को विद्यालय मां की गोद की तरह लगना चाहिए जिससे दूर रहकर उसे लगे कि उसके जीवन में कुछ खो गया है ऐसा तभी संभव हो सकता है जब विद्यालय पर्यावरण में उन्हें खेल मनोरंजन आदि के साधन घर से अधिक दिखाई देंगे तथा विद्यालय के वातावरण निर्माण में उनकी सहभागिता को सुनिश्चित किया जाएगा यूं ही विद्यालय बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं क्योंकि उन्हें एक साथ इतने अधिक मित्र प्रतिदिन एक ही स्थान पर अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकते अतः उनके इस लोभ को शैक्षणिक गतिविधि में किस प्रकार बनाए रखना है तथा उसका प्रयोग सीखने की प्रक्रिया में किस प्रकार करना है यह अध्यापक के शैक्षणिक कौशल पर निर्भर करता है शिक्षक का व्यक्तित्व और उसके द्वारा विद्यालय में करवाई जाने वाली गतिविधियां विद्यार्थियों के लिए अत्यधिक महत्व रखती है शिक्षक का व्यवहार बालक के प्रति सौहार्द पूर्ण होना चाहिए ताकि बालक अपनी समस्याओं को उसके समक्ष प्रकट कर सकें वे उसे अपने माता पिता के समान ही अपना शुभचिंतक समझे तथा हृदय से उसका आदर करें आदर या सम्मान आतंक के वातावरण से प्राप्त किया जा सकता है परंतु वह अस्थाई होता है तथा सीखने सिखाने की प्रक्रिया में बाधक है बालक स्वभाव से ही जिज्ञासु होता है अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वह कई प्रकार के प्रश्न पूछता है जो बिल्कुल सहज व अटपटे भी हो सकते हैं शिक्षक को उनकी जिज्ञासा को शांत करने का यथा संभव प्रयास करना चाहिए इससे बालक के मन में अध्यापक के प्रति विश्वास उत्पन्न होता है जो उसे अधिक सीखने के लिए प्रेरित करता है अध्यापक को विद्यार्थियों के साथ निकट संबंध स्थापित कर उनको विद्यालय की सफाई एवं सुरक्षा तथा कक्षा को साफ तथा सुंदर बनाने का कार्य सौपना चाहिए इससे उनके अंदर एक उत्तरदायित्व की भावना जागृत होती है वे कर्म की ओर प्रेरित होते हैं इसके लिए उन्हें समय-समय पर प्रोत्साहित करना चाहिए क्योंकि इससे बालक का मनोबल बढ़ता है
अध्यापक अपने परिवेश को समझ पाठ्यक्रम के लक्ष्यों को अपनी समझ और अनुभव से प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए एक शैक्षिक वातावरण तैयार करने के साथ-साथ शिक्षार्थियों के शैक्षणिक स्तर व पृष्ठभूमि को जानना अध्यापक का पहला कर्तव्य है उनकी सामाजिक आर्थिक दशा उनकी बोली आदि का ज्ञान अध्यापक को उन्हें सिखाने की प्रक्रिया में अत्यंत सहायक होता है अध्यापक उनकी इन बातों से पढ़ाने के अपने तरीके निकाल सकता है उनकी बोली के शब्दों के माध्यम से वह भाषा के ज्ञान को सुगमता से करवा सकता है अध्यापक को पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य पुस्तकों को बालकों के स्वभाव और परिवेश की संगति में कक्षा के अनुभव के साथ समायोजित करने में स्वयं को सक्षम बनाना चाहिए उसे ज्ञान को सूचना से अलग तथा शिक्षण कार्य को एक व्यवसायिक गतिविधि का रूप प्रदान करना चाहिए क्योंकि सक्रिय गतिविधि के माध्यम से ही बालक संसार से अपने लिए अर्थ ग्रहण करने का प्रयास करता है इसलिए अध्यापक द्वारा प्रत्येक साधन का प्रयोग इस तरह किया जाना चाहिए ताकि बालक स्वयं को अभिव्यक्त करने वस्तुओं से व्यवहार करने अपने प्राकृतिक व सामाजिक परिवेश की खोजबीन करने तथा स्वस्थ रुप से विकसित होने में सक्षम हो सके
आज पाठ्यचर्या के चार परिचित क्षेत्रों भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में सार्थक परिवर्तन किए जाने चाहिए ताकि शिक्षा आज और भविष्य की जरूरतों के लिए प्रासंगिक बन सके तथा शिक्षार्थी को व्यर्थ के तनावों से मुक्त रखा जा सके इसलिए अध्यापक को भी चाहिए कि विषय के बीच की दीवारों को कम करने का प्रयास करें ताकि बालक ज्ञान का समग्र आनंद ले सके भाषा जैसे विषय को केवल एक कालांश में पढ़ाए जाने वाला विषय नहीं समझना चाहिए उसे तो हर विषय के साथ पढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि यह हर विषय को पढ़ाने का माध्यम है बालक को जितना अधिक विषय ज्ञान होगा उतना ही वह अन्य विषयों को समझने में सक्षम होगा अध्यापक को चाहिए कि पाठ योजनाओं का निर्माण करते हुए उसमें विभिन्न गतिविधियों तथा शिक्षण अधिगम सामग्री के उचित उपयोग को अधिमान दे शिक्षक को बालक के ज्ञान को समझ में बदलने तथा उसे व्यवहार कुशल बनाने का प्रयास करना चाहिए तथा रटने रटाने वाली प्राचीन पद्धति को सदा के लिए तिलांजलि दे देनी चाहिए पिछले कुछ दशकों से विश्व में सामाजिक सांस्कृतिक वैज्ञानिक आदि सभी क्षेत्रों में तीव्र गति से परिवर्तन हो रहे हैं इसलिए अध्यापक को उन परिवर्तनों के साथ निरंतर शिक्षा के सिद्धांत को अपनाना चाहिए तभी वह गुणवत्ता शिक्षा प्रदान करने में मददगार साबित हो सकता है अध्यापक का अंतिम में मुख्य कार्य मूल्यांकन का है मूल्यांकन में बालक के विकास के सभी क्षेत्र -ज्ञान, समझ, कौशल और व्यवहारिक क्षमताओं के साथ-साथ उसके कार्यानुभवों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए वर्तमान की अंक पद्धति जिसमें प्रत्येक विषय के मात्र प्राप्तांक देखे जाते हैं इसके स्थान पर समय-समय पर किए गए मूल्यांकन की विभिन्न दिशाओं में सामाजिकता, दूसरों के साथ मिलकर कार्य करना, आत्मविश्वास आदि को भी रखा जाना चाहिए इसके एक कालम में बालक के सकारात्मक बलों अथवा उसकी कमियों को यदि बालक में है को रखा जाना चाहिए इससे यह निर्धारित होता है कि बालक पर कहां विशेष ध्यान देने अथवा प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है
अंततः यह कहा जा सकता है कि अध्यापक का चयन अपेक्षित शैक्षणिक वरियता के आधार पर होना चाहिए एक शिक्षक पर भावी पीढ़ी अथवा जन संसाधन के निर्माण का उत्तरदायित्व है उसका सुप्रशिक्षित होना तथा हर क्षेत्र में निरंतर हो रहे बदलाव से परिचित होना अत्यंत आवश्यक है यद्यपि उसे अपनी कक्षाओं में बालकों को सिखाने में अपने विवेक के साथ मदद करने की पूर्ण स्वतंत्रता है फिर सुप्रशिक्षित अध्यापक अपने कार्य निष्पादन में अधिक सफल होते हैं अतः यह आवश्यक है कि समय-समय पर कार्यशालाओं का आयोजन कर उसको अन्य अध्यापकों के साथ अपने अनुभवों को बांटने तथा दूसरों के अनुभवों से सीखने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए तभी वह अपने कार्य निष्पादन द्वारा विद्यार्थियों को गुणवत्ता शिक्षा प्रदान कर सकता है।

डॉ. मोनू सिंह गुर्जर
लेखक युवा शिक्षाविद है!

TRUE STORY

खबर नही, बल्कि खबर के पीछे क्या रहा?

http://www.truestory.co.in

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 + 9 =

error: Content is protected !!