UP के मुज़फ्फरनगर में मीरापुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पौराणिक स्थल शुक्रताल को अब तक ‘शुक्रतीर्थ’ का दर्जा न मिल पाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात नौजवान जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुमित खेड़ा ने एक प्रेस बयान जारी करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि शुक्रताल, जो कि लोकसभा बिजनौर क्षेत्र में आता है, महाभारत काल से जुड़ा एक अत्यंत प्राचीन और धार्मिक महत्व का स्थल है। देश के बड़े-बड़े नेता—मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री तक यहां आ चुके हैं, लेकिन हर बार केवल वादे और घोषणाएं ही की गईं, जमीन पर कोई ठोस कार्य नहीं हुआ।

सुमित खेड़ा ने आरोप लगाया कि स्वर्गीय सांसद संजय सिंह चौहान से लेकर मलूक नागर और वर्तमान युवा सांसद चंदन चौहान तक, सभी जनप्रतिनिधियों से उन्होंने व्यक्तिगत रूप से शुक्रताल की समस्याओं को लेकर बात की, लेकिन किसी ने भी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। हर बार उन्हें आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया।
उन्होंने आगे कहा कि यदि शुक्रताल को ऐतिहासिक दर्जा दिया जाता है, तो यह क्षेत्र विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकता है। इससे जमीनों के दाम बढ़ेंगे, पर्यटकों की संख्या में इजाफा होगा और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही, भारतीय संस्कृति और विरासत को देश-दुनिया के सामने बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया जा सकेगा। खेड़ा का कहना है—मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक, बड़े-बड़े चेहरे यहां आकर फोटो खिंचवाते हैं, माथा टेकते हैं और फिर वादों की गठरी बांधकर निकल लेते हैं। लेकिन शुक्रताल को ‘शुक्रतीर्थ’ बनाने की बात सिर्फ कागज़ों में ही दम तोड़ देती है।
अंत में उन्होंने कहा कि यदि हम ऐसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों को नजरअंदाज करते रहे, तो हम खुद ही अपने इतिहास को दुनिया से छिपाने के दोषी होंगे।
खेड़ा ने सवाल उठाया—आख़िर कब तक?
5000 साल पुराना ये स्थल आज भी पहचान के लिए तरस रहा है। अगर इसे ऐतिहासिक दर्जा मिल जाए तो यहां विकास की रफ्तार दौड़ सकती है, रोजगार के दरवाज़े खुल सकते हैं और देश-दुनिया में भारतीय संस्कृति की असली झलक दिखाई जा सकती है।
लेकिन अगर यही हाल रहा, तो इतिहास किताबों में नहीं, लापरवाही में दफन हो जाएगा… और जिम्मेदार भी हम ही होंगे!
शुक्रताल का इतिहास…
शुक्रताल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर ज़िले में स्थित एक बेहद प्राचीन और पवित्र स्थल है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि इसका इतिहास लगभग 5000 साल पुराना है और यह सीधे तौर पर महाभारत काल से जुड़ा हुआ है।
📜 पौराणिक कथा
शुक्रताल का सबसे बड़ा महत्व राजा परीक्षित और शुकदेव मुनि से जुड़ा है।
कथा के अनुसार, जब राजा परीक्षित को श्राप मिला कि 7 दिन में उनकी मृत्यु हो जाएगी, तब उन्होंने गंगा तट पर बैठकर मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग पूछा। उसी समय शुकदेव मुनि ने उन्हें 7 दिनों तक श्रीमद्भागवत कथा सुनाई।
यहीं से इस स्थान का नाम पड़ा —
👉 “शुकदेव” + “ताल (स्थान)” = शुक्रताल
🌳 अक्षय वट वृक्ष
यहां एक प्रसिद्ध और प्राचीन अक्षय वट वृक्ष भी है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह हजारों वर्षों से जीवित है और उसी के नीचे शुकदेव मुनि ने कथा सुनाई थी।
🛕 धार्मिक महत्व
यह स्थान गंगा नदी के किनारे स्थित है
यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं
कई आश्रम और मंदिर यहां मौजूद हैं
भागवत कथा और धार्मिक अनुष्ठान लगातार होते रहते हैं
🏛️ आज की स्थिति
इतना ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व होने के बावजूद शुक्रताल को अब तक वैसा राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दर्जा नहीं मिल पाया, जैसा मिलना चाहिए था। इसी वजह से अक्सर इसे “उपेक्षित धरोहर” भी कहा जाता है।













