फ़र्ज़ी रेप केस ने ख़त्म किया इंटर नेशनल खिलाडी का करियर.. 5 साल बाद मिली क्लीन चिट

भारत के लिए मेडल जीते, फिर रेप के आरोप में 5 साल जेल में काटे..
बरी हुए तो मां, करियर और सम्मान सब छिन चुका था

कभी बॉक्सिंग रिंग में मुक्कों से विरोधियों को धूल चटाने वाला खिलाड़ी आज भी जिंदगी के दिए जख्मों से लड़ रहा है। यह कहानी है हरियाणा के जिला हिसार के सोरखी गांव के बॉक्सर कृष्ण शर्मा की, जिसने देश के लिए मेडल जीते। भारत का नाम रोशन किया, लेकिन फिर एक ऐसे फर्जी मुकदमे में फंस गया जिसने उसकी पूरी दुनिया उजाड़ दी।

गरीब परिवार में जन्मे कृष्ण शर्मा ने अपनी पहचान पसीने और संघर्ष से बनाई थी। राज्य से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक उन्होंने सफलता के झंडे गाड़े। उनका सपना था ओलंपिक में तिरंगा लहराने का। लेकिन एक दिन पता चला कि बचपन में आंख के ऑपरेशन के दौरान लगाया गया लेंस उनके करियर की सबसे बड़ी बाधा बन गया। वर्षों तक मेडिकल टेस्ट पास करने वाले कृष्ण को अचानक खेल से बाहर कर दिया गया।

सपनों के टूटने का दर्द इतना गहरा था कि उन्होंने आत्महत्या तक का प्रयास किया। मगर माता-पिता ने उन्हें संभाला और फिर से खड़े होने की ताकत दी। कृष्ण ने हार नहीं मानी और अपनी बॉक्सिंग अकादमी शुरू कर दी। धीरे-धीरे उनके शिष्य मेडल जीतने लगे। उन्हें लगा कि खिलाड़ी नहीं तो कोच बनकर ही सही, वह देश के लिए अपना सपना पूरा करेंगे।

लेकिन किस्मत ने एक और वार किया।
शादी हुई, प्यार हुआ, फिर रिश्ते टूट गए। अलगाव के बाद विवाद अदालत और पुलिस तक पहुंच गया। कृष्ण का दावा है कि इसके बाद उनकी जिंदगी में ऐसा तूफान आया जिसने सब कुछ तबाह कर दिया। एक नाबालिग के यौन शोषण के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पॉक्सो जैसे गंभीर कानून के तहत मामला दर्ज हुआ और रातों रात वह सम्मानित खिलाड़ी से जेल का कैदी बन गए।

जेल की सलाखों के पीछे बीतते दिन किसी सजा से कम नहीं थे। जमानत की हर कोशिश नाकाम होती रही। इसी बीच उनकी मां बेटे पर लगे आरोपों का सदमा बर्दाश्त नहीं कर सकीं और दुनिया छोड़ गईं। कृष्ण अपनी मां की चिता को मुखाग्नि तक नहीं दे सके। जेल की चारदीवारी में बंद बेटे के लिए इससे बड़ा दर्द शायद कोई नहीं हो सकता।
करीब पांच साल तक मुकदमा चलता रहा। आखिरकार अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। फैसले में कहा गया कि आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला। मेडिकल रिपोर्ट भी आरोपों की पुष्टि नहीं करती थी। लेकिन अदालत से मिली राहत उनकी जिंदगी को पहले जैसा नहीं बना सकी।


दीपिका नारायण भारद्वाज ने मदद को बढ़ाया हाथ..
एकम न्याय संस्था की फाउंडऱ दीपिका नारायण भारद्वाज ने उनके लिए क्राउड़ फंडिंग का ऐलान किया हैं। ताकि निर्दोष होने के बाद भी 5 वर्ष तक अपराधी की तरह टॉर्चर झेलने वाले कृष्ण शर्मा को उनका खोया हुआ करियर दिला सके।

देश के लिए मैडल जीतने वाले कृष्ण शर्मा को 5 साल जेल में रहने के बाद मिला बेगुनाही का तमगा

जब कृष्ण जेल से बाहर आए तो बहुत कुछ बदल चुका था। मां नहीं थीं, करियर खत्म हो चुका था, अकादमी बदहाल थी और समाज की नजरों में वह अब भी आरोपी ही थे। जिन उपलब्धियों पर कभी गांव और शहर को गर्व था, वे सब मानो धुंधली पड़ चुकी थीं।
फिर भी कृष्ण शर्मा हार नहीं माने हैं। टूटे सपनों और बिखरी जिंदगी को समेटते हुए वह एक बार फिर अपनी बॉक्सिंग अकादमी को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस दर्द की भी है जिसमें अदालत से बरी होने के बाद भी जिंदगी की सजा खत्म नहीं होती।

5 साल जेल, मां की मौत और बर्बाद करियर… अदालत से बरी होने के बाद भी आसान नहीं कृष्ण की जिंदगी

कृष्ण शर्मा के लिए जेल से रिहाई किसी फिल्मी सुखांत की तरह नहीं थी। अदालत ने उन्हें आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन पांच साल में उनकी जिंदगी का बहुत कुछ छिन चुका था।

मुकदमे के दौरान उनकी मां का निधन हो गया। बेटे पर लगे गंभीर आरोपों और उसकी जेल यात्रा का सदमा वह सहन नहीं कर सकीं। कृष्ण को अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने तक की अनुमति नहीं मिली। यह दर्द आज भी उनके दिल में जिंदा है।
जेल से बाहर आने तक उनकी बॉक्सिंग अकादमी भी बदहाल हो चुकी थी। जिन खिलाड़ियों को वह तैयार कर रहे थे, वे बिखर गए और प्रशिक्षण केंद्र लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया। एक समय गांव और क्षेत्र का गौरव रहे कृष्ण को समाज की शंकाओं और तानों का भी सामना करना पड़ा।

कृष्ण कहते हैं कि अदालत से बरी होना एक कानूनी जीत जरूर थी, लेकिन इससे खोया हुआ समय, मां का साया और करियर वापस नहीं आया। इसके बावजूद वह हार मानने को तैयार नहीं हैं। अब उनका लक्ष्य अपनी बॉक्सिंग अकादमी को फिर से खड़ा करना और नए खिलाड़ियों को तैयार कर देश के लिए मेडल जीतने का सपना पूरा करना है।