देश के पुन: निर्माण में मुल्तानी समाज का योगदान सराहनीय

UP – MEERUT
देश की सामाजिक संरचना में कई ऐसे समुदाय हैं, जिन्होंने अपने श्रम, कौशल और समर्पण से देश की नींव को मजबूत किया, लेकिन समय के साथ उनका योगदान कहीं न कहीं उपेक्षा का शिकार हो गया। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण समुदाय है मुल्तानी समाज, जिसे पारंपरिक रूप से “पैदाइशी इंजीनियर” के रूप में जाना जाता है। लोहार और बढ़ई के रूप में उनकी पहचान केवल पेशा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक वैज्ञानिक और तकनीकी परंपरा का प्रतीक है।

यह बात सरधना के वरिष्ठ पत्रकार अहमद हुसैन मिर्ज़ा की पुत्री शगुफ़ा मिर्ज़ा ने कही…. शगुफा मिर्जा बी,एड और इंग्लिश लिटरेचर में मास्टर्स की डिग्री हासिल कर चुकी है। और अब अपने समाज के उत्थान के बारे में सोच रही हैं इसी सोच के तहत उन्होंने मुल्तानी बिरादरी को लेकर बताया कि इतिहास में मुल्तानी बिरादरी का गौरवशाली योगदान रहा है।

उन्होंने बताया कि मुल्तानी समाज का इतिहास अत्यंत समृद्ध और गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में जब युद्ध होते थे, तब इस समाज के कारीगर राजा-महाराजाओं के लिए उच्च गुणवत्ता वाले अस्त्र-शस्त्र तैयार करते थे। तलवार, भाले, बरछी, ढाल जैसे हथियारों के निर्माण में उनकी विशेष दक्षता थी। उनकी बनाई गई युद्ध सामग्री न केवल मजबूत होती थी, बल्कि युद्ध के दौरान सैनिकों की सुरक्षा और विजय में अहम भूमिका निभाती थी।
शुगुफा मिर्ज़ा ने बताया कि केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले कृषि क्षेत्र में भी मुल्तानी समाज का योगदान अतुलनीय रहा है। इस समाज ने किसानों के लिए हल, बैलगाड़ी, कुदाल, फावड़ा, दरांती जैसे उपकरण तैयार किए, जिससे खेती अधिक आसान और उत्पादक बनी। आधुनिक युग में भी इस समाज के कारीगर कृषि यंत्रों के निर्माण और मरम्मत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं। उनका मानना है कि यदि उस समय ये तकनीकी उपकरण उपलब्ध न होते, तो कृषि उत्पादन इतना प्रभावी नहीं हो पाता। इस दृष्टि से मुल्तानी समाज ने भारत को “सोने की चिड़िया” बनाने में प्रत्यक्ष योगदान दिया।

उन्होंने बताया कि मुल्तानी समाज की सबसे बड़ी विशेषता उसका हुनर आधारित ज्ञान है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है। बिना किसी औपचारिक डिग्री के, इस समाज के कारीगर जटिल तकनीकी कार्यों को बड़ी कुशलता से अंजाम देते हैं। धातु को आकार देना, लकड़ी को उपयोगी संरचना में बदलना, औजारों की डिजाइनिंग और उनकी मजबूती सुनिश्चित करना ये सभी कार्य उनकी व्यावहारिक इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाते हैं।

वर्तमान स्थिति और चुनौतियां

इतिहास में इतने बड़े योगदान के बावजूद, आज मुल्तानी समाज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। बदलते समय के साथ मशीनों और बड़े उद्योगों के आने से पारंपरिक कारीगरों का काम प्रभावित हुआ है। आर्थिक संसाधनों की कमी, तकनीकी प्रशिक्षण का अभाव और सरकारी योजनाओं तक सीमित पहुंच के कारण यह समाज मुख्यधारा से पीछे रह गया है।
उनका कहना है कि हर सरकार ने मुल्तानी समाज के योगदान को नजरअंदाज किया है। न तो उनके पारंपरिक कौशल को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए गए और न ही युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर मिल पाए। उन्होंने सरकार से मांग की है कि मुल्तानी समाज के पारंपरिक कौशल को सरकारी स्तर पर मान्यता दी जाए
स्किल डेवलपमेंट योजनाओं से जोड़ा जाए कारीगरों को आर्थिक सहायता और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जाएं, उनके उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए विशेष प्लेटफॉर्म दिए जाएं।
उन्होंने बताया कि मुल्तानी समाज के जागरूक लोग अब विभिन्न माध्यमों विशेषकर मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए अपने समुदाय की पहचान और योगदान को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका उद्देश्य है कि देश को मुल्तानी समाज का असली, देशभक्त और मेहनतकश चेहरा दिखाया जाए, ताकि उन्हें वह सम्मान और अवसर मिल सके जिसके वे हकदार हैं।

उन्होंने बताया कि मुल्तानी समाज केवल एक कारीगर वर्ग नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी और आर्थिक प्रगति का आधार रहा है। आज आवश्यकता है कि इस समाज के योगदान को स्वीकार कर उसे सशक्त बनाया जाए। यदि उचित समर्थन और अवसर मिलें, तो यह समुदाय एक बार फिर देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मुल्तानी समाज देश की उस मजबूत नींव की तरह है, जिस पर भारत की समृद्धि की इमारत खड़ी है बस जरूरत है उसे पहचानने और संवारने की।