पापा.. तुम जीत गए, में हार गया? मेरी लाश को हाथ मत लगाना

कानपुर कचहरी में दर्दनाक कदम: 24 वर्षीय प्रशिक्षु अधिवक्ता ने पांचवीं मंजिल से लगाई छलांग, सुसाइड नोट में बचपन से मानसिक पीड़ा का जिक्र

UP के कानपुर शहर की कचहरी परिसर मे एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। 24 वर्षीय प्रशिक्षु अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव ने पांचवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना के बाद परिसर में अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में लोग मौके पर जुट गए।

मौके से बरामद दो पेज के सुसाइड नोट में प्रियांशु ने अपनी आखिरी इच्छा जताते हुए लिखा कि जो भी इसे पढ़े, वह अंत तक जरूर पढ़े। नोट में उन्होंने अपने पिता राजेंद्र कुमार के साथ रिश्तों में कड़वाहट, अपमान और लंबे समय से चले आ रहे मानसिक दबाव का विस्तार से जिक्र किया है।

प्रियांशु ने लिखा कि उन्होंने वर्ष 2025 में लॉ की पढ़ाई पूरी की थी, लेकिन बचपन से ही कई घटनाएं उनके मन में गहरे जख्म छोड़ती रहीं। उन्होंने बताया कि महज छह साल की उम्र में फ्रिज में रखा मैंगोशेक चुपके से पी लेने पर पिता ने उन्हें निर्वस्त्र कर घर से बाहर निकाल दिया था। यह घटना उनके मन में ऐसी बैठ गई कि वह शर्मिंदगी जीवनभर उनका पीछा करती रही।
सुसाइड नोट के अनुसार, पढ़ाई को लेकर अत्यधिक दबाव, अधूरी तैयारी पर पिटाई और हर पल शक की नजर से देखे जाना उन्हें भीतर ही भीतर तोड़ता रहा। उन्होंने लिखा कि हर मिनट का हिसाब लिया जाना और लगातार निगरानी में रहना उनके लिए मानसिक प्रताड़ना जैसा था।

सबके सामने बेइज्जत करना नहीं भूलते थे पिता”
प्रियांशु ने अपने नोट में लिखा कि प्रताड़ना की एक सीमा होती है, लेकिन जब वह नफरत में बदल जाए तो हालात असहनीय हो जाते हैं। कक्षा नौ में विषय चयन से लेकर कम अंक आने पर निर्वस्त्र कर घर से निकालने की धमकी के डर ने उन्हें अपनी पसंद के खिलाफ विषय लेने पर मजबूर किया।
उन्होंने यह भी लिखा कि हाईस्कूल में कम अंक आने पर वह घर छोड़कर मथुरा तक चले गए थे। बचपन में एक रुपये का सिक्का चुराने की घटना को भी पिता बार-बार लोगों के सामने दोहराकर उन्हें शर्मिंदा करते थे।
नोट के अंत में उन्होंने बेहद भावुक शब्दों में लिखा—
“ऐसे पिता भगवान किसी को न दे… पापा जीत गए, उन्हें जीत मुबारक हो।”
साथ ही उन्होंने यह इच्छा जताई कि उनके पिता उनके शव को न छूएं।
सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। मामले की जांच जारी है और परिजनों से पूछताछ की जा रही है।

दबाव, अपमान और दूरी… कब रिश्ते बन जाते हैं मानसिक बोझ

कानपुर कचहरी की घटना सिर्फ एक आत्महत्या का मामला नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों में बढ़ते तनाव और संवाद की कमी का आईना भी है। 24 वर्षीय प्रशिक्षु अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव के सुसाइड नोट में बार-बार एक ही बात उभरकर सामने आई—बचपन से मिला दबाव, अपमान और डर।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों पर अनुशासन के नाम पर अत्यधिक सख्ती, बार-बार अपमानित करना या हर वक्त निगरानी रखना धीरे-धीरे उनके आत्मसम्मान को कमजोर कर देता है। जब बच्चा अपनी बात खुलकर नहीं रख पाता, तो अंदर ही अंदर कुंठा और अकेलापन बढ़ने लगता है।
प्रियांशु के नोट में बचपन की छोटी-छोटी घटनाओं—जैसे एक गलती पर कठोर सजा, सबके सामने शर्मिंदा करना या पसंद के खिलाफ फैसले थोपना—का जिक्र यह दिखाता है कि ऐसी बातें समय के साथ खत्म नहीं होतीं, बल्कि मन में गहरे बैठ जाती हैं।


विशेषज्ञ मानते हैं कि—
बच्चों के साथ संवाद की कमी सबसे बड़ा कारण बनती है
डर के माहौल में पला बच्चा आत्मविश्वास खो देता है
बार-बार की बेइज्जती रिश्तों में दूरी और नफरत पैदा कर सकती है
आज के दौर में प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के बीच अभिभावकों का दबाव बढ़ना आम है, लेकिन संतुलन और संवेदनशीलता उतनी ही जरूरी है। सख्ती और मार्गदर्शन के बीच की पतली रेखा को समझना हर परिवार के लिए अहम है।
यह घटना याद दिलाती है कि रिश्तों में जीत-हार नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और संवाद सबसे जरूरी हैं—क्योंकि कभी-कभी अनकहे जख्म ही सबसे गहरे होते हैं।