समर्पण की काव्य गोष्ठी में बिखरे अदब के रंग, शायरों ने कलाम से जीता दिल

मुज़फ्फरनगर में हिंदी-उर्दू साहित्य का खूबसूरत संगम, नामचीन शायरों की रचनाओं पर गूँजी वाहवाही

मुज़फ्फरनगर।हिंदी-उर्दू साहित्यिक संस्था ‘समर्पण’ की रचनात्मक मासिक काव्य गोष्ठी योगेंद्रपुरी में गोष्ठी के आयोजक हाजी सलामत राही के आवास पर आयोजित की गई। गोष्ठी में हिंदी और उर्दू के नामचीन साहित्यकारों एवं शायरों ने अपनी खूबसूरत रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता हाजी सलामत राही ने की, जबकि संचालन डॉ. आस मोहम्मद ‘अमीन’ ने किया।

गोष्ठी में अलीगढ़ से पधारे जनाब वफ़ा नक़वी तथा देवबंद से आए नाहीद समर, काविश देवबंदी और जुगाड़ देवबंदी की विशिष्ट उपस्थिति रही। संरक्षक के रूप में योगेंद्र सोम एवं अब्दुल हक़ सहर की सहभागिता ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई। इसके अतिरिक्त डॉ. मोहम्मद यूसुफ और डॉ. फ़र्रुख़ हसन की उपस्थिति भी विशेष रही।

शायरों ने अपनी रचनाओं से जीता दिल

गोष्ठी में अब्दुल हक़ सहर ने जीवन की सच्चाई को इन पंक्तियों में व्यक्त किया—

ज़िन्दगी मुँह देखती रह जाएगी,
नाम की तख्ती लगी रह जाएगी।

डॉ. वफ़ा नक़वी, अलीगढ़ ने अपनी संवेदनशील रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—

बस इक निशान-सा बाकी था कच्चे आँगन में,
परिंदा लौट के आया तो मर चुका था दरख़्त।

गोष्ठी के अध्यक्ष हाजी सलामत राही ने अपने आत्मविश्वास को इन शब्दों में बयां किया—

माना कि जंग हारा हूँ, मजबूर तो नहीं,
तंदरुस्त हूँ, कोई माज़ूर तो नहीं।

कलीम त्यागी ने जुदाई के दर्द को शेर में ढालते हुए कहा—

तेरी फ़ुरक़त रुला देती है सहरा में मुझे उस दम,
तेरा जब रेत पर खींचा हुआ चेहरा नहीं रहता।

तहसीन क़मर असारवी ने अपने अशआर से खूब वाहवाही बटोरी—

हमने हर दर्द ख़ुद सहा अपना,
हमनवा कोई हमख़याल न था।

योगेंद्र सोम ने अपनी रचना में आस्था और श्रद्धा के भाव व्यक्त किए—

कहाँ से शुरू करूँ, कहाँ करूँ अंत,
आप ही हैं नबी मेरे, आप से है पंथ।

नदीम अख़्तर नदीम ने फ़नकार की ज़िंदगी और उसके संघर्ष को इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया—

जीते जी फ़नकार था गुमनाम-सा,
बाद मरने के मिले तमग़े कई।

नाहीद समर, काविश देवबंदी ने अपने शेर में छिपे हुए ख़तरों की ओर इशारा किया—

ज़हर का जो मंत्र लिख्खा हमने काग़ज़ पे समर,
आस्तीं में जो छुपे थे साँप, ज़ाहिर हो गए।

जुगाड़ देवबंदी ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में कहा—

मेरी शादी का हुआ जो तज़किरा इस शहर में,
जून, जुलाई के महीने भी सुहाने लग गए।

डॉ. आस मोहम्मद ‘अमीन’ ने इंसान के व्यवहार पर कटाक्ष करते हुए कहा—

जितनी बुराई आज के इंसाँ में है, अमीन,
इतना बुरा यहाँ कोई हैवान भी नहीं।

योगेश सक्सेना ने रिश्तों की अहमियत को अपनी रचना में उजागर किया—

कोई कम समझता है, कोई कब समझता है,
रिश्तों की अहमियत को कोई कब समझता है।

मोहम्मद लईक ने वर्तमान समय की एक बड़ी समस्या को शायरी के माध्यम से सामने रखा—

*ना दिलदार की तलाश है, ना प्यार की तलाश है,*
*परेशान हूँ यारों, रोज़गार की तलाश है।*

सुनीता सोलंकी ने अपनी प्रेरणादायक पंक्तियों से श्रोताओं को प्रभावित किया—

*रोज़ घुट-घुट न यूँ ही मरा कीजिए,
*फ़ैसला गर करो तो ख़रा कीजिए।

साहित्यिक एकता और रचनात्मकता का संदेश

इस अवसर पर डॉ. मोहम्मद यूसुफ ने कहा कि समर्पण संस्था की गोष्ठी में शामिल होकर उन्हें बहुत गौरव और प्रसन्नता का अनुभव हुआ। उन्होंने आयोजन की सराहना करते हुए इसे साहित्यिक गतिविधियों के लिए एक अच्छा प्रयास बताया। डॉ. फ़र्रुख़ हसन की उपस्थिति ने भी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

गोष्ठी में उपस्थित सभी रचनाकारों और शायरों ने अपनी कविताओं एवं ग़ज़लों के माध्यम से साहित्य, समाज, मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों और जीवन की सच्चाइयों को खूबसूरती से प्रस्तुत किया। पूरे कार्यक्रम में श्रोताओं की ओर से दाद और सराहना का सिलसिला जारी रहा।

अंत में गोष्ठी के अध्यक्ष हाजी सलामत राही ने सभी रचनाकारों, अतिथियों और उपस्थित साहित्यप्रेमियों का आभार व्यक्त किया।