दिव्यांगो को राजनीतिक आरक्षण क्यों नहीं??

एम बिलाल मंसूरी
समाज के पिछड़े वर्गों को सशक्त बनाने या मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आरक्षण उनकी सहायता करता है चुनाव के दौरान चुनावी सीटों पर कहीं ओबीसी, कहीं एससी/एसटी तो कहीं महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कर दी जाती हैं ताकि राजनीति में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके और राजनीति में आकर अपने समाज का नेतृत्व कर सकें।
महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने वाला बिल राज्यसभा में पारित हो चुका है लेकिन वह संसद संसद में लंबित पड़ा हुआ है जिसे कई बार पारित कराने की कोशिश की गई लेकिन कई दलों ने उसका विरोध किया जिसकी वजह से वह अभी तक कानून नहीं बन पाया है, लेकिन इसके बावजूद 2019 की 17 वी लोकसभा में महिलाओं की संख्या 78 है। इसके अलावा भी महिलाएं विधायक, एमएलसी, राज्यसभा सदस्य आदि के पदों पर आसीन है। वही दूसरी ओरलोकसभा की 543 सीटों में से एससी/एसटी के लिए 131 सीटें रिजर्व है जिनमें एससी के लिए 84 व एसटी के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं। इसी तरह भारत की सभी विधानसभाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के लिए आरक्षण है जिसमें बिहार में 40 उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 2017 के चुनाव में 403 सीटों में से 86 आरक्षित थीं। जबकि उत्तर प्रदेश के 1952 के चुनाव में अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के लिए 430 सीटों में से 83 सीटें व 1980 से 1996 तक 425 सीटों में से 93 सीटें आरक्षित थी। विकलांगो में गिरिराज शरण सिंह उर्फ बच्चू सिंह 1952 में भरतपुर (राजस्थान) से वह चौथी लोकसभा 1967 में मथुरा (उत्तर प्रदेश) से निर्दलीय जीत कर संसद में पहुंचे थे। नेत्रहीन साधन गुप्ता 1953 में चुनाव जीते गुप्ता कम्म्युनिस्ट पार्टी सीपीआई के सदस्य थे, 1953 में श्यामप्रसाद मुखर्जी की कश्मीर में हत्या के बाद दक्षिण-पूर्व कलकत्ता उपचुनाव से जीते थे। इसके बाद 1957 में पूर्वी कलकत्ता से व 1969 में कालीघाट विधानसभा में जीते। दूसरे नेत्रहीन यमुना प्रसाद शास्त्री 1977 में भारतीय लोक दल पार्टी से व 1989 से रीवा (मध्य प्रदेश) सीट से सांसद बने, पोलियो ग्रस्त जयपाल रेड्डी चार बार विधायक, पांच बार लोकसभा सदस्य और दो बार राज्यसभा सदस्य रहे थे।।
पी डब्लू डी एक्ट act 1995 में विकलांगो को रोजगार, शिक्षा व अधिकारों के संरक्षण की बात कहीं गई है इसके साथ ही इस कानून में बिजनेसमैन को विकलांगों के साथ बुरा व्यवहार करने व नौकरी न देने पर जुर्माना व दंड का प्रावधान है। लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि 2016 में केंद्र सरकार जुर्माना व दंड के प्रावधान को खत्म करना चाहती थी केंद्र सरकार का तर्क था कि बिजनेसमैन पर जुर्माना व दंड का प्रावधान हमारे देश में विदेशी कंपनियों के आने के लिए बाधा है। आप यह बताएं कि क्या कंपनियों में विकलांगों को नौकरी नहीं मिलनी चाहिए? क्या विकलांगों के साथ अभद्र व्यवहार करने वाली कंपनियों को जुर्माना नहीं मिलना चाहिए? इसमें विदेशी कंपनियों के लिए कौन सी बाधा है? सक्रिय कार्यकर्ताओं और विकलांग संगठनों के विरोध के कारण बदलाव तो टाल दिया गया है लेकिन इस प्रावधान का प्रचार प्रसार नहीं किया जाता है जो बहुत निंदनीय है यदि इस प्रावधान का प्रचार प्रसार किया जाता है तो विकलांगो का अपमान अभद्र व्यवहार करने वालों को सजा मिलेगी जिससे विकलांगों का सम्मान बढ़ेगा।
आरपीडब्ल्यूडी एक्ट 2016 में विकलांगों की 7 श्रेणियों को बढ़ाकर 21 कर दी गई इसके साथ ही विकलांगों के लिए 3% से बढ़ाकर 4% आरक्षण कर दिया गया हालांकि 21 श्रेणी के विकलांगों के लिए 4% आरक्षण बहुत कम है जो कम से कम 8% होना चाहिए। लेकिन चुनाव के दौरान कोई भी सीट विकलांगों के लिए आरक्षित नहीं की गई अलग-अलग सीटों पर विकलांगों को चुनाव लड़ने के लिए सीटें आरक्षित की जाती है तो विकलांग भी सरकार का हिस्सा बनेंगे और अपने समाज का नेतृत्व करते हुए मुख्यधारा में आकर अपनी समस्याओं को उठा सकते हैं एक ओर विकलांगों की क्षमता की तारीफ की जाती है कहा जाता है कि विकलांगों के अंदर दिव्य शक्ति है और उनको विकलांग की जगह दिव्यांग कहना चाहिए दूसरी ओर उनको राजनीतिक आरक्षण से अछूत रखा हुआ है लेकिन क्या नाम बदलने से विकलांगों की समस्याएं दूर हो जाएंगी ? क्या विकलांगों को सशक्त बनाने और मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राजनीतिक आरक्षण की जरूरत नहीं है? विकलांग हितों के लिए नाम बदलने के बजाय कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे जिससे विकलांग भी सशक्त बन सके जैसे पीडब्ल्यूडी एक्ट 1995 का पालन करते हुए 18 वर्ष तक की आयु वाले विकलांगों को फ्री शिक्षा का प्रावधान हो, वह चाहे किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थान में पढ़ता हो, विकलांगों को स्कूल से लाने व ले जाने के लिए सरकारी गाड़ी का प्रबंध होना चाहिए, विकलांगों के साथ अभद्र व्यवहार करने वाले को दंडित के प्रावधान को प्रभावी रूप से लागू किया जाए, अलग-अलग सीटों पर प्रत्येक चुनाव में विकलांगों के लिए सीटें आरक्षित की जाए, ऐसा नहीं है कि विकलांगों की सिर्फ यही समस्याएं हैं विकलांगो की अनेक समस्याएं और मांगे हैं जिन्हें सरकार के समक्ष रखा जाएगा लेकिन आज का विषय राजनीतिक आरक्षण को लेकर है अब देखना यह होगा कि विकलांगों की बात करने वाले इन मुद्दों को कितनी जोरशोर से उठाएंगे और विकलांगों के प्रति सरकार कितनी गंभीर दिखेगी?

bilalmansuri2014@gmail.com

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