द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद भी जनभागीदारी के बिना संभव नहीं उर्दू का विकास
उर्दू ज़ुबान हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब और साझा संस्कृति की पहचान है। यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि देश की मिली-जुली विरासत और भाईचारे की प्रतीक है। जिस तरह भारत में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग बिना किसी भेदभाव के रहते हैं, उसी प्रकार उर्दू भाषा में भी हर ज़ुबान के शब्द शामिल हैं।
उर्दू केवल किसी एक समुदाय की भाषा नहीं है, बल्कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी की साझा ज़ुबान है। उर्दू के विकास में विभिन्न धर्मों के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
देश के कई राज्यों जैसे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और झारखंड में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1989 में उर्दू को यह दर्जा दिया गया तथा 1995 में विभिन्न सरकारी कार्यालयों में उर्दू अनुवादकों की नियुक्ति भी की गई।
सरकारी प्रावधानों के अनुसार उर्दू में आवेदन-पत्र स्वीकार करना, महत्वपूर्ण आदेशों व अधिसूचनाओं का उर्दू में प्रकाशन, सरकारी विज्ञापनों तथा संकेत पट्टों में उर्दू का प्रयोग सुनिश्चित करना शामिल है।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल कानूनी दर्जा मिल जाने से उर्दू का संपूर्ण विकास संभव है? विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज स्वयं आगे बढ़कर उर्दू के प्रयोग को दैनिक जीवन में शामिल नहीं करेगा, तब तक उसका वास्तविक विकास अधूरा रहेगा।
उर्दू के प्रसार के लिए आवश्यक है कि लोग अपने घरों में उर्दू में बातचीत करें, बच्चों को हिंदी और अंग्रेज़ी के साथ उर्दू भी सिखाएं, विवाह और सामाजिक कार्यक्रमों के कार्ड उर्दू में भी छपवाएं तथा दुकानों और प्रतिष्ठानों पर उर्दू में नेम प्लेट लगवाएं। इसके अतिरिक्त उर्दू अख़बार और पत्रिकाओं का नियमित अध्ययन तथा सार्वजनिक स्थलों पर उर्दू के प्रयोग को बढ़ावा देना भी आवश्यक है।
समाज के जागरूक वर्ग का मानना है कि उर्दू का विकास केवल सरकारी प्रयासों से नहीं बल्कि जनसहभागिता से संभव है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सब मिलकर भाषा के सम्मान और उसके उपयोग को अपने व्यवहार में उतारें।
“न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तान वालों,
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।”
लेखिका:
इकरा परवीन
B.el.Ed, M.ed.
(उर्दू प्रेमी एवं सामाजिक चिंतक)
9870705243













