कारवां-ए-मुहब्बत का 92वां आयोजन, सुबह चार बजे तक गूंजती रही शायरी
जश्न-ए-आजादी के तहत आयोजित ऑल इंडिया मुशायरा-कवि सम्मेलन में देशभर से पहुंचे शायर और कवि, अमर शहीदों को किया नमन

झिंझाना (शामली)। कारवां-ए-मुहब्बत हिंदी-उर्दू ऑल इंडिया ट्रस्ट के 92वें आयोजन के तहत शनिवार रात बिरज फार्म में जश्न-ए-आजादी : एक शाम देश के अमर शहीदों के नाम विषय पर ऑल इंडिया मुशायरा, कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में देशभर से पहुंचे शायरों और कवियों ने देशभक्ति, भाईचारे, मोहब्बत और सामाजिक सरोकारों से जुड़े कलाम पेश कर श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी।
कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध शायर वसीम झिंझानवी ने किया। समारोह की अध्यक्षता बज्म-ए-शाहीन, बेंगलुरु के चेयरमैन अल्हाज बाबाजी ने की। क्षेत्रीय विधायक सुरेश कुमार एमएलसी ने फीता काटकर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। मुख्य अतिथि पूर्व चेयरमैन नौशाद ठेकेदार ने शमा रोशन कर मुशायरे का शुभारंभ किया।
आयोजक वसीम झिंझानवी के निमंत्रण पर खुमार देहलवी, डॉ. जुबैर अंसारी लखनवी, नफीस कानपुरी, ताबिश खैराबादी, नईम अख्तर देवबंदी, चांद देवबंदी, इमरान झिंझानवी, जीशान झिंझानवी, ताबिश रामपुरी, अब्दुल जब्बार शारिब, पैकर पानीपती, तहसीन कमर असारवी और प्रदीप मायूस समेत देश के विभिन्न हिस्सों से कई नामचीन शायर और कवि झिंझाना पहुंचे।

देशभक्ति के कलाम पर बजीं तालियां..
वसीम झिंझानवी ने देशप्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए पढ़ा—
“हिन्दू-मुस्लिम का ये दुलारा लगता है।
हमको तिरंगा जान से प्यारा लगता है।
सरहद के उस पार भला हम क्यों जाएँ,
हिंद का ज़र्रा-ज़र्रा प्यारा लगता है।”
उनके इस कलाम पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं और देशभक्ति के जज्बे से पूरा माहौल गूंज उठा।
नईम अख्तर देवबंदी ने मोहब्बत के कलाम से बांधा समां
नईम अख्तर देवबंदी ने अपने कलाम से श्रोताओं की खूब दाद बटोरी। उन्होंने पढ़ा—
“तेरी दीदार की हसरत में चले आते हैं।
हम ही पागल हैं मुहब्बत में चले आते हैं।”
उनके इस कलाम पर देर तक तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती रही।
तहसीन कमर असारवी के शेरों पर भी मिली दाद
तहसीन कमर असारवी ने मोहब्बत के रंग में डूबे अपने कलाम से श्रोताओं को खूब प्रभावित किया। उन्होंने कहा—
“लग गए वो हमें मनाने में,
लुत्फ़ आता है रूठ जाने में।
उड़ के आ जाऊँ तुम बुलाओ तो,
देर लगती है कितनी आने में।”
इन अशआर पर भी श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं।
खुमार देहलवी के कलाम पर भी श्रोताओं ने खूब दाद दी। वहीं इमरान झिंझानवी, अब्दुल जब्बार शारिब झांसी, पैकर पानीपती समेत अन्य शायरों ने अपने बेहतरीन कलाम पेश किए।
रात 10 बजे शुरू हुआ मुशायरा, सुबह चार बजे तक चला
मुशायरा रात करीब 10 बजे शुरू हुआ और शायरी का सिलसिला सुबह लगभग चार बजे तक चलता रहा। बड़ी संख्या में नगरवासी और साहित्य प्रेमी पूरी रात कार्यक्रम में मौजूद रहे। श्रोताओं ने शायरों और कवियों को बेहद मोहब्बत और दिलचस्पी के साथ सुना तथा तालियों की गड़गड़ाहट से उनका उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम के दौरान देश की एकता, गंगा-जमुनी तहजीब, आपसी भाईचारे और अमर शहीदों के बलिदान को याद किया गया। वक्ताओं ने साहित्य को समाज में प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का संदेश पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बताया।
समापन पर बज्म-ए-कारवां-ए-मुहब्बत की ओर से सभी शायरों, कवियों, अतिथियों, गणमान्य नागरिकों और उपस्थित श्रोताओं का आभार व्यक्त किया गया। आयोजकों ने कहा कि इस तरह के साहित्यिक आयोजन देश की साझा संस्कृति, भाईचारे और हिंदी-उर्दू अदब को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।













