हिंदी-उर्दू की साझा विरासत का संदेश दे गई समर्पण गोष्ठी

कवि-शायरों की रचनाओं ने बांधा समां, साहित्यकारों का हुआ सम्मान

मुजफ्फरनगर। हिंदी-उर्दू साहित्यिक संस्था ‘समर्पण’ की रचनात्मक गोष्ठी असारा हाउस, योगेंद्रपुरी में साहित्यकार तहसीन अली असारवी के आवास पर आयोजित हुई। गोष्ठी में हिंदी-उर्दू साहित्य, भाषा और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने पर कवियों और शायरों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से विचार रखे। इस दौरान सभी साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता गीतकार ईश्वर दयाल गुप्ता ने की, जबकि संचालन डॉ. आस मोहम्मद अमीन ने किया। गोष्ठी का शुभारंभ श्रीमती वीणा गर्ग ने सरस्वती वंदना और कलीम त्यागी ने नात-ए-शरीफ से किया।
गोष्ठी में रचनाकारों ने एक से बढ़कर एक रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इस अवसर पर कर्मवीर सिंह ने कहा, “साहित्य की गंगा बहे, यमुना बहे प्रेम की।”


ईश्वर दयाल गुप्ता ने पढ़ा, “तू अपने होंठों पे कलम रखा कर, जिंदगी के रुख को नरम रखा कर।”

अब्दुल हक सहर ने कहा..
“अज़मते मुझ पे फकीरों की हुई है रोशन, इसलिए छोड़ के शाहों को गुलाम आया।”

योगेंद्र सोम एडवोकेट ने अपनी रचना में कहा..
“इश्क ने इश्क को आवाज दी, बता तो सही जरा अपनी जमीन।”

शमीम किरतपुरी ने रिश्तों की हकीकत पर कहा..
वक्त की मार ने रिश्तों की हकीकत खोली, कोई रिश्ता न बुरे वक्त में काम आया है।”

डॉ. वीणा गर्ग ने पढ़ा..

“चांद को बादलों ने घेरा है, इसलिए आज कुछ अंधेरा है।”

अहमद मुजफ्फरनगरी ने कहा..

“अपनी ताकत पे तकब्बुर है सितमगर को क्यों, पानी मिट्टी से सभी को तो बनाया उसने।”

सलामत राही ने दिल का हाल बताया…
“मैं जब से उसके गेसुओं की कैद से निकल गया, ये कह रहे हैं मुझसे सब कि तू बहुत बदल गया।”

तहसीन कमर असारवी ने अपने जज़्बात अल्फाजो मे उकेरे..

“दिल की कहानी कह न सके, आंखों से सब कुछ कह गए। जो अपने थे वो दूर हुए, कुछ रिश्ते ऐसे ढह गए।”

रामकुमार शर्मा रागी ने कहा…
“मेरी खामियों को गिनाना छोड़ दे, बेहतर है कि मुझसे मिलना छोड़ दे। ये दुनिया है जख्मों के सिवा क्या देगी, मरहम लगाना जख्म सिलना छोड़ दे।”

कलीम त्यागी ने अपनी रचना में कहा..

“पासबां सबका कहूं या उसको मैं गाफिल कहूं, कौम की राहों में कांटे बो रहा है आदमी।”

डॉ. आस मोहम्मद अमीन ने पढ़ा..

“राज मेरा मेरे सीने में छुपा रहता है, इतनी सी बात पे वो मुझसे खफा रहता है।”

अल्ताफ मशल ने कहा..
“कभी क्या पता ये ठोकर ही बदल के रख दे किस्मत, मेरे रास्ते के पत्थर, मेरे रास्ते में रहना।”

शहजाद अली ने हिंदी-उर्दू की साझी संस्कृति को अपनी पंक्तियों में पिरोते हुए कहा…

जुबां अलग सही, जज्बात वो एक हैं। हिंदी-उर्दू के हालात तो एक से हैं। समर्पण ने सजाया है जो आज ये गुलिस्तां, बताते हैं कि हम सबके खयालात एक हैं।”

शायरों और कवियों की प्रस्तुतियों पर श्रोताओं ने जमकर दाद दी। कार्यक्रम में मुजफ्फरनगर के अलावा शामली और बिजनौर से बड़ी संख्या में कवि, शायर और साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। गोष्ठी ने हिंदी और उर्दू साहित्य की साझा संस्कृति, आपसी प्रेम और भाईचारे का सुंदर संदेश दिया। कार्यक्रम के संयोजक तहसीन अली असारवी रहे। इस अवसर पर उपस्थित साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया।