साहित्य

विश्व पर्यावरण दिवस

5 जून को मनाते हर वर्ष,
विश्व पर्यावरण दिवस।
पर स्वार्थी मानव की,
दिनों दिन बढ़ती गई हवस।

विकास के नाम पर,
करता जा रहा है विनाश।
अंधाधूंध पेड़ों को काटने से,
जंगलों का हो गया ह्रास।

बढ़ते प्रदूषण से श्वास लेना,
हो रहा है बड़ा दूभर।
प्रकृति का दोहन रोज करके,
भी इंसान के नही आया सब्र।

हर 100 साल में आती है,
कोरोना जैसी माहमारियां।
पर इंसान बाज नही आता,
करता है कारगुजारियां।

प्रकृति मां रूप में करती है,
मानव का पालन पोषण।
बदले में इसको भी चाहिए,
करना प्रकृति का संरक्षण।

पर यह तो भारी मशीनों से
रोज करता है बेहद खनन।
मारी गई इसकी बुद्धि,
नही करता चिंतन मनन।

कोरोना महामारी में श्वास के,
पड़ गए थे भंयकर लाले।
फिर भी नासमझ बना है,
नही खुले अक्ल के ताले।

पर्यावरण संरक्षण से ही,
होगा मानव जीवन का रक्षण।
जल जीव जंगल बचे,
सबको रोकना होगा प्रदूषण।

सबको लेनी होगी कसम,
जीवन में लगाने की पेड़।
चलानी होगी बडी मुहिम,
खाली नहीं रहे कोई मेड़।

हंसराज हंस
कवि और शिक्षक
टोंक राजस्थान।

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