करन नागर, खेल प्रभारी श्री द्रोणाचार्य (पी जी) कॉलेज दनकौर ग्रेटर नोएडा एवं
अध्यक्ष –भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा दनकौर मंडल।
प्रतिदिन की गई छोटी-छोटी मेहनत एक दिन पहाड़ जैसी बड़ी सफलता में बदल जाती है। इस कहावत को सच करते हैं हमारे देश के अनगिनत खिलाड़ी, जो अपना पूरा जीवन खेल के मैदान में समर्पित कर देते हैं। उनके मन में केवल एक ही सपना होता है—एक दिन अपने देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना और तिरंगे को गर्व से ऊँचा लहराते देखना।
किसी भी खेल को बाहर से देखने पर वह जितना सरल और सहज लगता है, वास्तव में उतना होता नहीं है। दर्शकों के लिए तालियाँ बजाना और प्रतिक्रिया देना आसान होता है, लेकिन एक खिलाड़ी के लिए उस स्तर तक पहुँचने की तैयारी अत्यंत कठिन होती है। वर्षों की मेहनत, अनुशासन, त्याग और आत्मसंयम के बाद ही कोई खिलाड़ी मैदान में उतर पाता है।
कहा जाता है कि खेल का मैदान बड़े से बड़े विवादों को सुलझाने की क्षमता रखता है और ऐसा कई बार देखा भी गया है। लेकिन आज भी एक महत्वपूर्ण सवाल मौन बना हुआ है—क्या हम खिलाड़ियों के संघर्ष को वास्तव में समझ पाते हैं? एक खिलाड़ी की असली परीक्षा मैदान के बाहर शुरू होती है, जहाँ उसे संसाधनों की कमी, आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक दबावों से जूझना पड़ता है।
प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने के लिए कभी फटे हुए जूतों से समझौता करना पड़ता है, तो कभी अधूरी डाइट पर अभ्यास करना पड़ता है। रहने, खाने-पीने और एक शहर से दूसरे शहर तक यात्रा करने के लिए उसे अनेक जुगाड़ करने पड़ते हैं। लेकिन जब वह मैदान में उतरता है, तो उसे ये सारी परेशानियाँ दिखाई नहीं देतीं। उसकी आँखों में केवल एक ही लक्ष्य होता है—मेडल और देश का सम्मान।
हालांकि, कई बार अथक प्रयासों के बावजूद सफलता कुछ कदम दूर ही रह जाती है। ऐसे समय में समाज के लिए उस खिलाड़ी पर निर्णय देना आसान होता है, लेकिन उस खिलाड़ी के लिए दोबारा शून्य से शुरुआत करना अत्यंत कठिन होता है। असफलता के बाद भी हिम्मत न हारकर फिर से खड़ा होना ही एक सच्चे खिलाड़ी की पहचान होती है।
इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि खिलाड़ी का संघर्ष वही स्वयं जान सकता है। हमें केवल उनकी जीत पर ही नहीं, बल्कि उनके संघर्ष, त्याग और मेहनत पर भी गर्व करना चाहिए। देश के इन सच्चे नायकों को सम्मान, सहयोग और प्रोत्साहन देना हम सभी की जिम्मेदारी है।














