साहित्य

खानपान से कविता तक राज करती है उर्दू….

✍️ डॉ. सैयद अहमद ख़ान

उर्दू…यह सिर्फ़ एक जुबान नहीं, बल्कि तहज़ीब की नर्मी, मुहब्बत की मिठास और संस्कृति की जड़ में बहती वह धारा है जिसने हिंदी को हमेशा संवारकर रखा है। हिंदी और उर्दू का रिश्ता बहनापे का है। एक के बिना दूसरी अधूरी है। लेकिन अफ़सोस कि आज की नफ़रती हवाओं में इस रिश़्ते को तोड़ने की कोशिशें हो रही हैं। उर्दू को एक ख़ास मज़हब, एक ख़ास तबक़े की ज़ुबान बताकर हाशिये पर धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। मगर यह भूल है। क्योंकि उर्दू को मिटाना, दरअसल अपनी ही संस्कृति को मिटाना है।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उर्दू…
सोचिए, सुबह अख़बार पढ़ते ही कितने उर्दू शब्द आँखों के सामने आ जाते हैं—“लाजवाब”, “बरक़रार”, “बावजूद”, “इंतेज़ार”, “तहक़ीक़ात”…। कोई इन्हें उर्दू मानता है? नहीं। सब इन्हें हिंदी का ही हिस्सा समझते हैं। यही तो उर्दू की सबसे बड़ी ताक़त है—वह खुद को अलग नहीं मानती, बल्कि हिंदी में घुल-मिलकर उसे और समृद्ध करती है।

आज की व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी से ज्ञान लेने वाली पीढ़ी भी जाने-अनजाने उर्दू से ही अपनी भावनाएँ बयान करती है—कभी “मो
मुहब्बत” लिखकर, कभी “तन्हाई” में डूबकर।

कविताओं और शायरी का जादू…

हिंदी कविताओं का रंग अधूरा है अगर उसमें उर्दू का तिलिस्म न हो। मंचों पर गूँजती कविताएँ हों या फिल्मों के गीत हर जगह “जज़्बात”, “ख़्वाब”, “आरज़ू” जैसे अल्फ़ाज़ कानों को छूते हैं और दिल में उतर जाते हैं। यही उर्दू का जादू है, जो कविता को सुर देता है और शायरी को रूह।

स्वाद की दुनिया में उर्दू...

ज़रा पुरानी दिल्ली की गलियों में चलिए—अगर वहां से उर्दू हटा दी जाए तो न दुकानों के नाम बचेंगे, न पकवानों की पहचान। जलेबी का “ख़मीर” न हो तो मिठास कैसे बनेगी? “बिरयानी”, “कोरमा”, “कबाब”, “निहारी”—इन नामों के बिना तो हमारी थालियाँ बेरौनक हो जाएँगी। उर्दू सिर्फ़ किताबों की भाषा नहीं, वह हमारे ज़ायके में भी है, हमारी महक में भी है।

वाक़ई, यह भाषा मिटती नहीं—क्योंकि यह हर दिल में ज़िंदा है।
नफ़रत नहीं, मोहब्बत की ज़ुबान…

सच्चाई यही है कि उर्दू और हिंदी का रिश्ता तोड़ना किसी हुकूमत के बस की बात नहीं। यह रिश्ता ज़ुबानों का ही नहीं, बल्कि तहज़ीब और मोहब्बत का है।नई पीढ़ी को यह बताना ज़रूरी है कि जिन व्यंजनों का वह लुत्फ़ उठाती है, जिन गीतों की धुन पर झूमती है—उनमें उर्दू की रूह बसी है।
इसलिए ज़रूरत नफ़रत को बढ़ाने की नहीं, बल्कि उर्दू को गले लगाने की है। क्योंकि हिंदी और उर्दू साथ हों, तो हमारी ज़िंदगी की ज़ुबान और भी रंगीन, और भी ख़ुशबूदार हो जाती है।

( लेखक उर्दू ड़वलपमेंट आर्गेनाइजेशन क़े राष्ट्रीय अध्यक्ष है )

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