साहित्य

महान क्रन्तिकारी जननायक वीर विजय सिंह पथिक का राष्ट्र चिन्तन

गुर्जर इतिहास वीरता, शौर्य और अदम्य साहस से परिपूर्ण है। जमीन से जुडे गुर्जर समाज का इतिहास सवर्णिम अंक्षरों से रचा बसा है। राष्ट्र प्रेमी वंचितों एवं शोषितों के अग्रिम पंक्ति के नेता जिन्होंने भारत को कई भीतरी एवं बाहरी खतरों से बचाने में अपना बलिदान दिया, उस जुझारू समाज का दिवाकर ’वीर गुर्जर, विजय सिंह पथिक’ का जन्म एक क्रान्तिकारी परिवार में 27 फरवरी 1882 में हुआ था।

बुलन्दशहर जिले के गांव गुठावली कलां का गुर्जर परिवार माटी से जुडा क्रान्तिकारी परिवार था। इनके दादा इन्द्र सिंह बुलन्दशहर में मालागढ़ रियासत में दीवान के पद पर थे, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में दादा इन्द्रसिंह के शौर्य और बलिदान की गाथा में रमा इनका बचपन एक सशक्त योद्धा का निर्माण कर रहा था। योद्धा किसानों का, मजदूरों का और समाज के हाशिये पर खडे लोगों का। जिनके अधिकारों की बात करना उस दौर में कठिनतम कार्यों में से था।

अंग्रेजी हुकूमत के खौफ के आगे आम जनता जिन सवालों को उठाने से भय खाती थी, गुर्जर परिवार निडरता से सबका पक्ष रखता था। इनके बचपन में लोग इन्हें भूप सिंह के नाम से पुकारते थे, पिता हमीर सिंह गुर्जर को ब्रिटिश हुकूमत ने 1857 की क्रान्ति मेें योगदान देने के लिए गिरफतार कर लिया, इनकी मां कमल कुमारी पर इसका गहरा प्रभाव पडा, जिसका सीधा असर पूरे परिवारिक वातावरण पर देखा जा सकता था। बचपन देश की आजादी के सपनों ने सींचा, बडे हुए तो हाशिये पर खडे लोगों का जीवन सवारने में लग गये। घर-परिवार से पहले भारत को मजबूत राष्ट्र बनाने के स्वप्न में जुट गये, महान वीर गुर्जर विजय सिंह पथिक जी!

भारत के गौरव विजय सिंह पथिक अंग्रेजी हुकूमत के गहरे आलोचक थे, इसलिए युवावस्था में ही परिवार की जिम्मेदारी उठाने से ज्यादा देश में आजादी की वकालत की हिमाकत की, और जुड गयेे रास बिहारी बोस एवं शचीन्द्र नाथ सान्याल जैसे क्रान्तिकारियों के साथ। यह वह दौर था जब ब्रिटिश हुकूमत उन तमाम क्रान्तिकारी गतिविधियों को कुचलने में देर नहीं लगाती थी, जिनमें स्वतंत्रता की किरण नज़र आने लगती थी। इसलिए सन् 1915 में फिरोजपुर षडयन्त्र की घटना के पश्चात् इन्होंने अपना असली नाम भूपसिंह से बदलकर विजयसिंह पथिक रख लिया, और इसी नाम से ना केवल भारत अपितु इग्लैण्ड की भी ब्रिटिश हुकूमत की आंखों में खटकते रहे। गरीब को गरीबी से बाहर निकालने का जो प्रण उन्होंने लिया वह उनकी विरासत की देन थी।

आजादी के इतने पहले यदि मजदूर, किसानों की समस्याओं को किसी ने फांक कर देखा, तो वो वीर गुर्जर विजय सिंह पथिक जी ही थे, जिनकी आंखों में हर वक्त मजबूर किसानों की तंगहाली दिखती थी, मजदूरों के शोषण और अन्याय को दूर करने की जददों जहद में हर वक्त तल्लीन रहते थे भूप सिंह गुर्जर जी। पथिक जी का स्वप्न था कि भारत को शोषण, अन्याय मुक्त बनाना है, वो भी तत्कालीन परिस्थितियों में जबकि आम जनमानस का जीवन अंग्रेजो के हाथों जकडा हुआ था, उनका अथक प्रयास जारी था।

महात्मा गांधी के किसान आन्दोलनों से बहुत पहले आपने देश में पहला विशाल किसान आन्दोलन ’बिजौलिया आन्दोलन’ के रूप में खडा किया। जिसका उददेश्य मजबूती से किसान के शोषण और अन्याय के विरूद्ध अलख जगाना था। सन 1912 में राजधानी परिवर्तन और हार्डिंग पर बम काण्ड की गतिविधियों में रास बिहारी बोस, जोरावर सिंह, प्रताप सिंह, के साथ पथिक जी का भी नाम शामिल था जिससे अंग्रेजों से बचने में सफल हुए और फरार हो गए। पथिक जी रास बिहारी बोस के नेतृत्व में 1857 की तर्ज पर एक बडा आन्दोलन तैयार करना चाहते थे, जिसमें अंग्रेजों को उकसाने और राजाओं को अपनी तरफ विद्रोह में शामिल करना था, पथिक जी को राजस्थान का नेतृत्व संभालना था। लेकिन पथिक जी फिरोजपुर षडयन्त्र में अंग्रेजों की आंखों में पहले से चुभ रहे थे, जिसके लिए उन्हें भूमिगत होना पडा।

यकीनन हवाओं का रूख दूसरी ओर था, लेकिन पथिक जी का हौसला सदैव बुलन्द रहा, इसलिए अंग्रेजो से छुपते-छुपाते अपनी तैयारियों में कभी कमी नहीं होने दी। आगे जाकर लाहौर केस में भी उनका नाम उछला, तब भी वीर गुर्जर अंग्रेजों की आंखों में धूल झोकने में सफल रहे। ब्रिटिश हुकूमत से बचने के लिए उन्होंने राजस्थानी राजपूतों सा वेश धारण किया एवं चित्तौडगढ़ में रहने लगे। बिजौलिया से आये एक साधु सीताराम दास से वे बहुत प्रभावित हुए और उनके कहने पर ही बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व संभाला। बिजौलिया उदयपुर रियासत का एक छोटा सा हिस्सा था, जहां किसानों पर घोर अन्याय किया जा रहा था। शोषण और अन्याय से पीडित किसानो को तंगदस्ती में भी मोटी रकम हुकूमत को मालगुजारी के रूप में देनी पडती थी।

बिजौलिया जाकर पथिक जी ने उन किसानों की हालत देखकर उन्हें इस अन्याय से मुक्ति का प्रण लेकर सन् 1916 में आन्दोलन का नेतृत्व अपने हाथों में लिया और इतिहास को एक मजबूत आन्दोलनों की राह भी दिखाई। किसानों का आर्थिक शोषण इस हद तक था कि उनसे 84 प्रकार के कर वसूल किए जाते थे, युद्धकोष कर, साहूकारों का शोषण जैसी समस्याओं के कारण किसानों की कमर तोड कर रख दी थी। उन्होंने गांव-गांव में किसान पंचायत की कई शाखाऐं खोली।

किसानों की भूमि सुधार मांग, अधिभारों एवं बेगार से सम्बन्धित मुददों को समाज और सरकार के समक्ष रखने का सफल प्रयास किया। जमीन से जुडे इस जननायक के प्रयासो का परिणाम था, कि पंचायत ने भूमि कर न देने का निर्णय लिया। यह वह दौर था जब विश्व में रूसी क्रान्ति 1917 की खूब चर्चाऐं हो रही थी, समाज को साधने के महारथी जननायक पथिक जी ने आम-जनमानस को इस क्रान्ति से प्रेरित करके भारत में किसानों की शोषण से आजादी का बिगुल फूंका। जिसकी चर्चाऐं गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने अखबार ‘प्रताप’ में जोर-शोर से की हैं।

पथिक जी ने किसानों के दर्द को बम्बई जाकर महात्मा गांधी को बतायी। गांधी जी ने वचन दिया कि यदि मेवाड की सरकार किसानों का दर्द दूर नहीं करती तो वे स्वयं बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व संभालेंगे। गांधी जी ने महाराणा को पत्र भी लिखा, लेकिन कोई समाधान न निकला।

पथिक जी जननायक थे! उन्होंने जनता की बात, जनता के साथ रखने का निश्चय किया। तत्पश्चात वर्धा से राजस्थान केसरी नामक पत्र निकाला जो कि जनता में बहुत लोकप्रिय हो गया, लेकिन उनकी विचारधारा जमनालाल बजाज से मेल न खाई और वे वर्धा छोडकर अजमेर आ गए। जनता के नायक अपनी कोशिशों में धार लाने के लिए सन् 1920 में अजमेर में ही राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की, ताकि लोगों से जुडाव और भी ज्यादा हो सके। देखते ही देखते इस संस्था ने पूरे प्रदेश में अपनी शाखाऐं प्रसारित कर ली, और कई जनआन्दोलन का नेतृत्व किया। आगे चलकर अजमेर से पथिक जी का एक नया पत्र नवीन राजस्थान प्रकाशित हुआ। दिनों-दिन पथिक जी के प्रयासों से आन्दोलनों एवं सत्याग्रहों के माध्यम से किसानों की समस्याओं ने खूब जोर पकडा, जिसमें देशी राजाओं की निरंकुशता पर अंकुश लगाने का उन्होने पुरजोर प्रयास किया।

सन् 1921 आते-आते उन्होंने राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से बेगू, पारसोली, भिन्डर, बासी और उदयपुर के कई स्थानों में आन्दोलन का शंख बजाया। उत्तरप्रदेश में जन्में इस वीर ने राजस्थान के किसानों की जिम्मेदारी बडे शौक से निभायी, देखते ही देखते देश के कई हिस्सों में बिजौलिया आन्दोलन एक किसान शक्ति का सिंबल बन गया। पथिक जी ने जो स्वप्न किसानों की आखों में 1917 की रूस की क्रान्ति से देखा था, वह अब देश के कई हिस्सों में प्रेरणा का स्त्रोत बनने लगा।

ब्रिटिश हुकूमत की रातों की नींद उडना आरम्भ हो गयी। सरकार की दहशत इस हद तक बडी की उसने राजस्थान के ए.जी.जी. हालैण्ड को बिजौलिया किसान पंचायत बोर्ड और राजस्थान सेवा संघ से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। पथिक जी के परिश्रम के आगे ब्रिटिश हुकूमत ने धुटने टेकना आरम्भ कर दिया। उन्होंने एक प्रस्ताव की पेशकश की जिसमें किसानों की कई परेशानियां हल होती थी। अतः दोनों पक्षों के मध्य समझौता हो गया, किसानों की चैरासी में से पैंतीस लागतें माफ़ कर दी गई। कई सरकार के नुमाइदें बर्खास्त कर दिये गये, राजस्थान सहित भारत के प्रत्येक हिस्से के किसानों के आत्मबल को मजबूती मिली।

किसानों की यह बडी जीत थी। इसी समय बेगू में आन्दोलन की तीव्रता ने जोर पकड लिया। मेवाड सरकार ने उन्हें गिरफतार कर लिया और पांच साल की सजा सुनाई, पथिक जी अप्रैल 1927 में जेल से आजाद हुए।

विजय सिंह पथिक जी हाशियें पे खडे लोगों के हीरों थे। उनका जीवन समाज और राष्ट्र चिन्तन से भरा-पूरा है, जिसके प्रयासों में उन्होंने कई अखबार, पत्र-पत्रिकाओं का आरम्भ किया, जो समाज चिन्तन में बेहतरीन हथियार साबित हुए उन्होंनेे नव संदेश और राजस्थान संदेश, तरूण संदेश जो कि साप्ताहिक था प्रसारित किए। साथ ही राष्ट्रीय पथिक नाम से अपने विचार देश के सामने प्रकट किए।

उनकी कुछ लोकप्रिय पुस्तकें जिनमें अजय मेरू उपन्यास, पथिक प्रमोद कहानी संग्रह, पथिक जी के जेल के पत्र और पथिक जी की कविताओं का संग्रह मुख्य हैं। पथिक जी के समाज चिन्तन राष्ट्रव्यापी था। महान जननायक 29 मई सन् 1954 को चिर निद्रा में लीन हो गए। उनके प्रयासों से किसान, मजदूर, हाशिये पे खडे लोगों को जो प्रेरणा मिली वो आजादी की लडाई से अब तक जारी है, हर गरीब लाचार किसान, मजदूर को संबल देने के लिए। यकीनन महान जननायक वीर गुर्जर, विजय सिंह पथिक के राष्ट्र चिन्तन को देश कभी भुला नहीं पाएगा।

लेखिका-
डॉ. नाज़ परवीन

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