पीएमओं के आदेश के बावजूद राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् की गठन की प्रक्रिया ढाई साल बाद भी पूरी नहीं हुई उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन ने चिंता जताई

भारत के प्रमुख उर्दू संगठन उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (UDO) ने लगातार यह कोशिश की है कि सरकार द्वारा बनाए गए संस्थान,उर्दू अकादमियां या फिर राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् (NCPUL)यह सभी भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाए जाते है और इनके अंतर्गत काम करते है।जाहिर है जब ये सभी सरकारी मशीनरी हैं, तो इन्हें उसी तरह काम करना चाहिए जिस मकसद से इन्हें स्थापित किया गया है।अगर ये संस्था या परिषद् गठन के प्रक्रिया फेल होते हैं या नियमों के मुताबिक बेअसर हो जाते हैं, तो इसके लिए सीधे तौर पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जिम्मेदार होंगी।
यह बयान जारी करते हुए यूडीओं के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सैयद अहमद खान ने चिंता जताई और कहा कि राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आता है और इसके चेयरमैन शिक्षा मंत्री होता हैं, लेकिन बदकिस्मती से पीएमओं से सकारात्मक जवाब मिलने के बावजूद लगभग ढाई साल से इसका गठन नहीं हो पाया है।न तो बॉडी की मीटिंग हुई है और न ही राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् को देखने वाले मंत्रालय के मंत्री के पास समय है,तथा उपाध्यक्ष की भी अभी तक नियुक्ति नहीं हो पाई है। शिक्षा मंत्री ने पिछले ढाई साल से परिषद् के काम या आगे की प्लानिंग के लिए कोई मीटिंग नहीं की है, जिससे उर्दू तबके में चिंता की लहर दौड़ गई है।हम एक बार फिर सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह इस मामले को संजीदगी से ले क्योंकि उर्दू भाषा का मुद्दा एक राष्ट्रीय मुद्दा है।
उर्दू भाषा किसी खास फिरके या धर्म की भाषा नहीं है, यह भारत की भाषा है.उर्दू भाषा का जन्म इसी देश में हुआ और उर्दू भाषा यही फली फूली और परवान चढ़ी है.उर्दू पूरी दुनिया में एक असरदार भाषा के तौर पर पहचानी जाती है और आज भी यह प्यारी भाषा लाखों लोगों के दिलों पर राज करती है।उर्दू के महत्व और उपयोगिता और लोगों के बीच इसकी लोकप्रियता के उदाहरण देते हुए।
डॉ. सैयद अहमद खान ने कहा कि रेख़्ता जैसे मंच वर्तमान आवश्यकताओं के आधार पर उर्दू को लोगों तक पहुंचा रहे हैं और जब रेख़्ता दुवारा प्रोग्राम आयोजित किए जाते हैं, तो पैसे देने के बावजूद प्रवेश पास आसानी से हाथ नही आते, जो एक मजबूत तर्क है कि उर्दू प्रेमियों की संख्या कम नहीं बल्कि बहुत बड़ी है और यही कारण है कि हिंदी फिल्मों में उर्दू का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है।














