नई दिल्ली। ‘हम भारत के लोग’ द्वारा मंगलवार को कंस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया, नई दिल्ली में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें देशभर से आए प्रतिनिधि शामिल हुए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान ख़ुर्शीद ने कहा कि, यह प्रावधान है कि डिलिमिटेशन पर कोर्ट का दख़ल नहीं होगा। लेकिन इसके बावजूद असम में जो डिलिमिटेशन हुआ था उसपर सुप्रीम कोर्ट ने एक नोटिस जारी किया है। अगर इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट नोटिस जारी कर सकता है तो मुझे उम्मीद है कि अगर और प्रयास किया जाए तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से हमें कुछ राहत मिल सकती है। इसलिए होने वाले परिसीमन पर गहरी निगाह रखनी होगी।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि, समाज को सरकार और सत्ता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसलिए उसे विभाजित करने के किसी भी प्रयास का विरोध सिर्फ राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसका विरोध हर व्यक्ति को करना चाहिए. सरकार हमारे लोकतांत्रिक अधिकार छीनना चाहती है. वो राजनीतिक को समावेशी होने से रोकना चाहती है. ऐसे में हमें मिलने जुलने की संस्कृति और सिलसिले को बढ़ाना है.
वरिष्ठ अधिवक्ता शारिक़ अब्बासी ने कहा कि, डिलिमिटेशन का जो वर्तमान मसौदा है उसके कई खामियां हैं, दक्षिण भारत और उत्तर भारत में भी सीटों को लेकर काफ़ी सवाल हैं।

कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने कहा कि 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने कहा था की जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा होती है वहाँ जानबूझकर मुसलमानों प्रतिनिधित्व रोकने के लिए सुरक्षित कर दिया जाता है। साथ ही यह सुझाव दिया गया था कि जब भी डिलिमिटेशन हो तो इस बात का ख़याल रखा जाना चाहिए।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि “भाजपा के अलावा सभी राजनीतिक दलों ने सच्चर कमेटी का नैतिक समर्थन किया था, कुछ जगह इंप्लीमेंट भी हुआ। अब जब डिलिमिटेशन होने जा रहा है, हम उन सभी सेक्युलर पार्टियों को जो सच्चर कमेटी की हिमायत में खड़ी हुई थीं, कि ये नैतिक और राजनैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि जो परिसीमन होने जा रहा है उसको सच्चर कमेटी कि सिफारिशों की रौशनी में करने की माँग रखें।
उन्होंने कहा कि सरकार जनसांख्यिकी आयोग बनाकर जनसंख्या संतुलन के नाम पर पूरे देश में डिस्टर्ब्ड एरिया ऐक्ट लागू करने का माहौल बना रही है. इस संविधान विरोधी मंशा का विरोध किया जाना चाहिए।
राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद ने कहा कि दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व को घटाकर सरकार उन राज्यों को अलगथलग करने की कोशिश कर रही है. इसका देश की एकता और अखंडता पर गहरा असर पड़ेगा.
पत्रकार मसीहुज़्ज़मा अंसारी ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों को प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर अपने संघठन में भी गंभीरता दिखानी चाहिए और विभिन्न समुदाय के कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टियों में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने की पहल करनी चाहिए।
कार्यक्रम में अहमद हमीद, तमजीद अहमद, हुमायूँ बेग, डॉ शुएब, हेमंत प्रधान, मोहम्मद असलम, एडवोकेट सबीह अहमद, मोहम्मद कैफ़, मानवी सिंह, ज़ियाउर्रहमान व अन्य ने भी अपनी बातें साझा कीं। कार्यक्रम का संचालन डॉ ख़ालिद मोहम्मद ख़ान ने किया।
सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए गए…
1- 40 प्रतिशत से ज़्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीटों, जहाँ दलित आबादी मुसलमानों से कम हो को आरक्षित न किया जाए.
2- जिन सीटों पर दलित आबादी 40 प्रतिशत से ज़्यादा हो उन्हें सामान्य श्रेणी में न रखा जाए.
3- दक्षिण भारतीय राज्यों को आबादी नियंत्रण जैसे प्रगतिशील उपलब्धियों के लिए सीटों में कटौती करके सज़ा न दी जाए.
4- सीमांचल और बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाक़ों को अलग केंद्र शासित राज्य बनाने की योजना रोकी जाए.
5- मुस्लिम बहुल सीटों को आरक्षित न करने के सच्चर कमेटी और रंगनाथ कमेटी की सिफारिशों के प्रति सेक्युलर राजनीतिक दल अपनी प्रतिबद्धता साबित करें.
6- सुप्रीम कोर्ट अपने 2024 के फैसले जिसमें उसने संविधान की भावना के विपरीत किए गए परिसीमन की न्यायिक समीक्षा की बात कही है पर ईमानदारी से अमल करे.
7- मुस्लिम बहुल सीटों पर सेक्युलर पार्टियां मुस्लिम प्रत्याशी देना सुनिश्चित करें.
सम्मेलन में इस मुद्दे पर जागरूकता अभियान चलाने के लिए ’इंडिया अगेंस्ट अनफेयर डिलिमिटेशन’ का गठन किया गया.














