शायरी की महफ़िल में सजी बहराइच की अदबी शाम..


बज़्म-ए-अदब की शायरी नशिस्त में जुटे अहल-ए-क़लम, जवाद वारिस के शे’री मजमूए का हुआ विमोचन; कलीम त्यागी समेत शायरों ने पेश किया कलाम, सामईन ने दी जमकर दाद

UP क़े बहराइच में शेर-ओ-सुख़न की महफ़िल सजी तो शाम अदब के नाम हो गई। बज़्म-ए-अदब की ओर से आयोजित शायरी नशिस्त में शहर के मुमताज़ शायर, अहल-ए-क़लम और अदब-दोस्त लोग एक जगह जुटे। मौका था वरिष्ठ शायर जवाद वारिस के शे’री मजमूए ‘मताअ-ए-सुख़न’ के विमोचन का। किताब सामने आई तो महफ़िल में मौजूद लोगों ने इसे बहराइच की अदबी रवायत में एक अहम इज़ाफ़ा बताया।
कार्यक्रम में मुज़फ्फरनगर से आए कलीम त्यागी ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने अपना कलाम पेश किया तो महफ़िल में वाह-वाह और दाद की आवाजें गूंज उठीं। देर तक चली इस अदबी नशिस्त में शायरों ने अपने अशआर के जरिए मोहब्बत, ज़िंदगी, समाज और इंसानी एहसासात को शब्द दिए।

सिर्फ किताब नहीं, शायर के सफर का आईना है ‘मताअ-ए-सुख़न’

वक्ताओं ने कहा कि किसी शायर की किताब महज अशआर का संग्रह नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की अदबी रियाज़त, सोच, अनुभव और एहसास छिपे होते हैं। ‘मताअ-ए-सुख़न’ भी जवाद वारिस के लंबे अदबी सफर और उनके फ़िक्री अनुभवों की तस्वीर पेश करती है।
किताब के विमोचन पर जवाद वारिस ने सभी मेहमानों और अहल-ए-अदब का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि किताब का प्रकाशित होना शायर के लिए खुशी का मौका है, लेकिन असली खुशी तब होती है जब पाठक और सामईन उसके कलाम को मोहब्बत और तवज्जो के साथ पढ़ें और सुनें।
उर्दू को नई पीढ़ी से जोड़ना वक्त की जरूरत : कलीम त्यागी
कलीम त्यागी ने कहा कि उर्दू सिर्फ एक ज़बान नहीं, बल्कि देश की साझा तहज़ीबी और अदबी विरासत का हिस्सा है। नई पीढ़ी को उर्दू और अदब से जोड़ने के लिए ऐसी नशिस्तों, मुशायरों, किताबों और तालीमी कार्यक्रमों को बढ़ावा देना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि किसी भी जुबान की ज़िंदगी सिर्फ किताबों और इदारों में नहीं होती। उसका असल रिश्ता लोगों की ज़बान, मुतालए और नई नस्ल की दिलचस्पी से होता है। इसलिए उर्दू के फ़रोग़ के लिए हर शख्स को अपने स्तर पर कोशिश करनी चाहिए।
बहराइच की सरज़मी ने हमेशा दिया अदब को नया मुकाम

वसीउल्लाह ने कहा कि बहराइच की सरज़मीन का शे’र-ओ-सुख़न से पुराना और मजबूत रिश्ता रहा है। यहां की अदबी रवायत ने कई अहम शख्सियतों को जन्म दिया है। ऐसी महफ़िलें नई पीढ़ी को अपनी अदबी विरासत से जोड़ने का बेहतरीन जरिया हैं।
डॉक्टर सुफ़ियान अंसारी ने कहा कि मौजूदा दौर में जब लोगों का किताबों से रिश्ता कमजोर हो रहा है, तब अदबी महफ़िलों की अहमियत और बढ़ जाती है। नई पीढ़ी का किताब और साहिब-ए-किताब से रिश्ता मजबूत करना वक्त की अहम जरूरत है।
जमाल मज़हर सिद्दीक़ी ने ‘मताअ-ए-सुख़न’ को जवाद वारिस की लंबी अदबी रियाज़त का हासिल बताते हुए कहा कि इस किताब का विमोचन बहराइच की अदबी तारीख़ में एक खूबसूरत इज़ाफ़ा है।
अशआर गूंजे तो देर तक मिलती रही दाद
शायरी नशिस्त में शहर के कई शायरों ने अपना कलाम पेश किया। हर अच्छे शेर पर महफ़िल से वाह-वाह और दाद की आवाजें उठती रहीं। कलीम त्यागी ने भी अपना कलाम सुनाया, जिसे सामईन ने खूब पसंद किया।
कार्यक्रम में रईस अंसारी, मंज़ूर बहराइची, जुनैद सिद्दीक़ी, सिराजुद्दीन अंसारी, मज़हर सिद्दीक़ी, शादाँ बहराइची, एडवोकेट अब्दुलहक़ समेत कई शायरों, अहल-ए-क़लम और अदब-दोस्त लोगों ने शिरकत की।

वक्ताओं ने कहा कि ऐसी अदबी महफ़िलें समाज में सोच को विस्तार देने के साथ तहज़ीबी शऊर और मुतालए का ज़ौक़ पैदा करती हैं। बज़्म-ए-अदब बहराइच की इस कोशिश को सराहते हुए उन्होंने कहा कि अदबी सरगर्मियों का यह सिलसिला नई पीढ़ी के लिए रोशनी और मशाल-ए-राह का काम करेगा।
शुक्रिया-ए-कलाम के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। शेर-ओ-सुख़न, वाह-वाह और अदब की खुशबू से सजी यह शाम बहराइच की अदबी यादों में एक और खूबसूरत बाब जोड़ गई।