मुज़फ्फरनगर के शायर कलीम त्यागी के सम्मान में जुटे शायर-अदीब, उम्दा अशआर ने बांधा समां
UP के ऐतिहासिक शहर बहराइच की फिज़ा में जब शेरो-शायरी के रंग घुले तो देर रात तक महफिल में वाह-वाह की आवाजें गूंजती रहीं। मौका था बज़्म-ए-पयाम-ए-अदब बहराइच की ओर से मुज़फ्फरनगर के शायर और अदीब कलीम त्यागी के सम्मान में आयोजित शेरी नशिस्त ‘एक शाम कलीम त्यागी के नाम’ का।
दरगाह शरीफ स्थित नूरुद्दीन चक में नवाज़ बहराइची के आवास पर सजी इस अदबी महफिल की अध्यक्षता उस्तादुश्शोअरा मुजीब सिद्दीक़ी ने की, जबकि संचालन मशहूर शायर नज़र बहराइची ने किया। महफिल के संयोजक मंज़ूर अहमद रहे।
अशआर पढ़े गए तो महफिल में बरसी दाद

महफिल में बहराइच और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में शायर, अदीब और अहल-ए-जौक़ जुटे। किसी ने मोहब्बत का दर्द बयां किया तो किसी ने बदलते दौर और सामाजिक हालात पर शेर पढ़े। हर उम्दा शेर के बाद सामईन की ओर से ‘वाह-वाह’ और दाद की आवाजें सुनाई दीं।
मुजीब सिद्दीक़ी ने पढ़ा—
दिल की ख़्वाहिश थी बहुत फिर भी लिया ज़ब्त से काम
उस ने देखा भी नहीं, हम ने पुकारा भी नहीं।
मुहम्मद याक़ूब अज़्म के शेर ने भी खूब दाद बटोरी—
जहाँ हमज़बाँ कोई ठहरा न अपना
वहाँ भी हम अपनी ज़बाँ छोड़ आए।
जमाल अज़हर ने कहा—
वो एक जाम नशा जिस का ता-हयात रहे
हज़ार जाम से वो एक जाम बेहतर है।
वहीं शादाँ रहमानी ने मोहब्बत और शनासाई के रंग में कहा—
ये कैसी मोहब्बत है, ये कैसी शनासाई
उन को भी न रास आई, मुझ को भी न रास आई
‘मैं ज़माने के लिए एक आईना हो जाऊँगा’
मंज़ूर बहराइची ने दौर-ए-हाज़िर पर अपने अंदाज़ में कहा—
नहीं इस दौर में कोई किसी का
मज़ा आए तो कैसे ज़िंदगी का।
नज़र बहराइची का यह शेर भी सामईन को खूब पसंद आया—
मुझ में अपना अक्स देखेगा ज़माना एक दिन
मैं ज़माने के लिए एक आईना हो जाऊँगा।
नवाज़ बहराइची ने भी अपने कलाम से महफिल में रंग जमा दिया—
कैसे बाज़ार-ए-क़यामत में ख़रीदेंगे बहिश्त
सिक्का हुस्न-ए-अमल जबकि सिफ़र रखते हैं।
कलीम त्यागी ने शायरी के जरिए नफरत पर साधा निशाना
महफिल के केंद्र में रहे सम्मानित शायर कलीम त्यागी ने अपने कलाम से मौजूदा हालात पर टिप्पणी की। उनके शेरों में अमन, हक़ और सच्चाई की आवाज सुनाई दी—
फैलाओ नफ़रतें यहाँ जी भर के हाकिमो!
नग़्मे जहाँ में अम्न के हम गाए जाएँगे
झूठों का बोल-बाला है इस दौर में कलीम
हम हक़परस्त हो के भी झुठलाए जाएँगे
कलीम त्यागी ने अपने सम्मान के लिए बज़्म-ए-पयाम-ए-अदब बहराइच और सभी शोरका का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि बहराइच के अदबी हल्के से मिली मोहब्बत, ख़ुलूस और अदबनवाज़ी को वह हमेशा याद रखेंगे।
मुजीब सिद्दीक़ी ने की कलीम त्यागी की अदबी सेवाओं की तारीफ
सदारती ख़िताब में मुजीब सिद्दीक़ी ने कलीम त्यागी की अदबी सेवाओं को सराहा। उन्होंने कहा कि उर्दू ज़बान और अदब के फरोग़ के लिए कलीम त्यागी का काम काबिल-ए-कद्र है। ऐसी अदबी सरगर्मियां नई पीढ़ी को भाषा और साहित्य से जोड़ने का काम करती हैं।
महफिल का आगाज मंज़ूर बहराइची की नअत-ए-पाक से हुआ। इसके बाद शायरों के कलाम का सिलसिला शुरू हुआ, जो रात करीब दस बजे तक चलता रहा। आखिर में अब्दुलहक़ एडवोकेट ने मनक़बत पेश की।
महफिल में डॉक्टर मुहम्मद सुफियान, फरहान खान, अब्दुलहक़ एडवोकेट, सिराजुद्दीन न्यूटन, प्रदीप बहराइची, महताब आलम, सरफराज़ खान, डॉक्टर हनान, कामिल नवाज़ खान समेत बड़ी संख्या में शायर, अदीब और अहल-ए-जौक़ मौजूद रहे।
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