राजनीतिक लाभ के लिए सांप्रदायिक माहौल बनाना दुर्भाग्यपूर्ण:तेज लाल भारती
फोरम ने कहा- शिक्षा संस्थानों को राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय इतिहास और तथ्यों को समझने की जरूरत
नई दिल्ली। मदरसों को लेकर राजनीतिक नेताओं की ओर से की जा रही बयानबाजी पर हकीम अजमल खां फोरम फॉर पीस एंड कम्यूनल हार्मनी ने कड़ी आपत्ति जताई है। फोरम के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज लाल भारती और महासचिव डॉ. सैयद अहमद खान ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि किसी भी शैक्षणिक या धार्मिक संस्था को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाकर समाज में सांप्रदायिक भावनाएं भड़काना देश के हित में नहीं है।
फोरम पदाधिकारियों ने कहा कि भारत विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं वाला देश है। ऐसे में राजनीतिक मंचों से दिए जाने वाले बयानों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। नेताओं को यह समझना चाहिए कि राजनीतिक लाभ के लिए किसी समुदाय या उसके शिक्षण संस्थानों को निशाना बनाने से सामाजिक दूरी बढ़ सकती है और इसका नुकसान पूरे देश को उठाना पड़ सकता है।
नफरत की राजनीति से नई पीढ़ी को गुमराह करने का आरोप
तेज लाल भारती ने कहा कि आज देश के सामने शिक्षा, रोजगार, आर्थिक विकास और सामाजिक समरसता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। इसके बावजूद धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दों को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच मतभेद पैदा करना किसी भी राजनीतिक दल या संगठन की रणनीति नहीं होनी चाहिए। भारत की मजबूती उसकी विविधता और आपसी भाईचारे में है। यदि समाज को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश की जाती है तो इससे लोकतांत्रिक मूल्यों और देश की एकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
भारती ने कहा कि विशेष रूप से युवाओं को नफरत और पूर्वाग्रह से दूर रखकर संविधान, लोकतंत्र, शिक्षा और सामाजिक सौहार्द के मूल्यों से जोड़ने की जरूरत है। उन्होंने राजनीतिक दलों से अपील की कि वे ऐसे मुद्दों पर संयमित भाषा का इस्तेमाल करें, जिनसे किसी समुदाय की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
मदरसों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता : डॉ. सैयद अहमद खान
फोरम के महासचिव डॉ. सैयद अहमद खान ने कहा कि मदरसों को केवल धार्मिक शिक्षा से जोड़कर देखना उचित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में लंबे समय से संचालित मदरसों ने शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में भी भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में अनेक ऐसे विद्वान, उलेमा और शिक्षित लोग रहे हैं, जिन्होंने सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी धार्मिक विद्वानों और मदरसों से जुड़े लोगों की भूमिका रही है।
डॉ. खान ने कहा कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश शासन की ओर से अनेक विद्वानों और धार्मिक संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। बड़ी संख्या में उलेमा को गिरफ्तार किया गया और कई संस्थानों को नुकसान पहुंचाया गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को किसी एक समुदाय या वर्ग तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।
इतिहास को राजनीतिक चश्मे से देखने से बचने की अपील
फोरम ने कहा कि देश के इतिहास में विभिन्न समुदायों और वर्गों के लोगों ने अपनी भूमिका निभाई है। इसलिए इतिहास के किसी भी हिस्से को केवल राजनीतिक बहस के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं है।
तेज लाल भारती ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार और राजनीतिक दलों की नीतियों पर सवाल उठाना सभी का अधिकार है, लेकिन किसी समुदाय के धार्मिक या शैक्षणिक संस्थानों को सामूहिक रूप से कटघरे में खड़ा करना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी संस्था में कोई अनियमितता सामने आती है तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कुछ मामलों के आधार पर पूरे समुदाय या सभी संस्थानों को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं है।
भाईचारा मजबूत करने की जरूरत
फोरम ने कहा कि देश की तरक्की के लिए सामाजिक शांति और आपसी विश्वास बेहद जरूरी है। विभिन्न समुदायों के बीच संवाद बढ़ाने और गलतफहमियां दूर करने की आवश्यकता है।
डॉ. सैयद अहमद खान ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना और ज्ञान का प्रसार करना होना चाहिए। मदरसा हो, स्कूल हो या कोई अन्य शिक्षण संस्थान—जहां भी शिक्षा दी जा रही है, वहां सुधार और बेहतर व्यवस्था पर सकारात्मक चर्चा होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश की एकता और अखंडता किसी एक समुदाय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।
फोरम की राजनीतिक दलों से अपील
हकीम अजमल खां फोरम ने राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों से अपील की कि वे सार्वजनिक मंचों से ऐसे बयान देने से बचें, जिनसे समाज में धार्मिक आधार पर तनाव पैदा हो। फोरम ने कहा कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन इन मतभेदों को सांप्रदायिक विभाजन का रूप नहीं दिया जाना चाहिए।
फोरम के अनुसार, देश की असली ताकत उसकी विविधता, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक भाईचारे में है। इसलिए राजनीतिक लाभ से ऊपर राष्ट्रहित और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।













