विश्व हिंदी दिवस पर “हिंदी प्रेमी प्रवासी भारतीयों के साथ एक परिचर्चा” आयोजित

विश्व हिंदी दिवस पर प्रवासी भारतीयों के हिंदी प्रेम पर परिचर्चा
विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर “हिंदी प्रेमी प्रवासी भारतीयों के साथ एक परिचर्चा” विषय पर एक वर्चुअल वेबिनार का आयोजन किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय परिचर्चा में नार्वे, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, मॉरीशस, सूरीनाम और श्रीलंका से जुड़े हिंदी विद्वानों एवं विदुषियों ने सहभागिता की और प्रवासी भारतीयों के राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अनुराग को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का आयोजन डॉ. सतीश कुमार शास्त्री द्वारा किया गया। वेबिनार का शुभारंभ प्रो. मनीष पांडेय, कुलपति, फोनिक्स यूनिवर्सिटी द्वारा कहानी पाठ के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. यशवीर सिंह, विभागाध्यक्ष, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली ने की।
मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. राकेश राणा, प्रोफेसर, एम.एम.एच. कॉलेज, गाजियाबाद ने हिंदी के विस्तार और विकास में प्रवासी भारतीयों के योगदान पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि विदेशों में बसे भारतीय समुदाय ने हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।
इस वैश्विक परिचर्चा के सफल आयोजन में सामुदायिक रेडियो स्टेशन से जुड़े बी. के. यशवंत पाटिल (अध्यक्ष) तथा एफ.आर.सी.एस. के डॉ. डी. पी. सिंह (महासचिव) का विशेष सहयोग रहा। कार्यक्रम के अंत में बी. के. यशवंत पाटिल ने सभी वक्ताओं एवं सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
सात समंदर पार भी गूंज रही हिंदी की पहचान
आज विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर दुनिया भर में हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान देखने को मिला। भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अफ्रीका और एशियाई देशों में बसे प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को अपनी संस्कृति और पहचान से जोड़े रखा है।
हर साल 10 जनवरी को मनाया जाने वाला विश्व हिंदी दिवस, हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के प्रयासों की याद दिलाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1975 में नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिंदी सम्मेलन से जुड़ी है। तभी से हिंदी ने सीमाओं को लांघकर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई।
विदेशों में बसे भारतीय समुदाय हिंदी के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हिंदी साहित्य, कवि सम्मेलन, नाट्य मंचन, रेडियो कार्यक्रम और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए हिंदी नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। कई विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है और शोध कार्य भी हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा है। तकनीक और सोशल मीडिया के इस दौर में हिंदी की पहुंच और भी व्यापक हुई है। आज हिंदी वैश्विक संवाद की सशक्त भाषा बनती जा रही है।
विश्व हिंदी दिवस का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि हिंदी को रोज़गार, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय संवाद की भाषा के रूप में मजबूत करना भी है। यही कारण है कि आज हिंदी दुनिया की प्रमुख भाषाओं में अपना स्थान बना चुकी है।
हिंदी है तो संस्कृति है, पहचान है और भविष्य है।




