नारी पुरुष के बराबर नहीं,बल्कि पुरुष से श्रेष्ठ, तभी नारी को नारायणी का दर्जा मिला

महिला दिवस पर विशेष:-
आज देश में कुछ नारी संगठन नारी की पुरुष की बराबरी की समानता की बात करते हैं, यह आवाज वो नारी संगठन उठा रही है, जिन्होंने शायद शास्त्र उठाकर नहीं पढ़े, शास्त्रों में नारी को पुरुष से पहले से ही श्रेष्ठता का दर्जा प्राप्त है, जब नारी पुरुष से पहले से ही श्रेष्ठ है, तो फिर अपनी उच्चतम श्रेष्ठा को त्यागकर पुरुष के बराबर निम्न श्रेष्ठा की मांग मैं कितनी प्रसंगिकता है,
क्योंकि आज के परिपेक्ष में पाश्चात्य संस्कृति ने कुछ नारी का नैतिक पतन कर दिया, या कहो कि सनातन संस्कृति से भटका लिया पश्चिमी देशों की आधुनिक परंपरा की नकल में वह अपनी आध्यात्मिक व चारित्रिक शक्ति को भूल चुकी, अगर हम अपने सनातन संस्कृति का बोध करें तो हमारे भगवान राम -कृष्ण से पहले भी नारी का नाम आता है, जैसे सीताराम, राधा कृष्णा, लक्ष्मी गणेश, और सीता ही राम की आदिशक्ति है राधा ही कृष्ण की अनंत शक्ति है, इसी नारी की शक्ति से परमात्मा विश्व का संचालन करते हैं,
*कुछ लोग कहते है की नारी का कोई घर नहीं होता लेकिन मेरा यकीन है के की नारी के बिना कोई घर, घर नहीं होता*।
आज समय है कि नारी अपनी आध्यात्मिक संस्कृति को पहचाने और पाश्चात्य संस्कृति का परित्याग कर देश को विश्व गुरु बनाने में अपना अहम योगदान दें, किंतु दुर्भाग्य हमारी नारियां फॉरेन कल्चर को अपना रही हैं, और फॉरेन कल्चर वाली नारियां भारतीय कल्चर को अपनाने में लगी है, हमें अपने से नहीं आज विदेशों को देखकर ही कुछ सीख लेनी चाहिए, आज भारत में लोग पाश्चात्य संस्कृति की कितनी भी नकल कर ले किंतु वास्तविक सुख भारतीय संस्कृति में ही है, भारतीय पहनावा, सभ्यता संस्कृति, यही हमारी विदेशों में पहचान है , जो हमें अन्य देशों से भिन्न करती है,जो हमें विश्व में एक विश्व गुरु के रूप में परिभाषित करती हैं।
*घर को स्वर्ग बनाती नारी*
*घर की इज्जत होती नारी*
*देव भी करते जिसकी पूजा*
*ऐसी प्यारी मूरत है नारी*।
और जिस घर में नारी का सम्मान नहीं होता वहां प्रेत निवास करते हैं, और जिस राष्ट्र में नारी का सम्मान नहीं होता वही आतंकवाद पनपता है,
आओ आज समय है महिला दिवस पर सभी नारी एकजुट होकर अपने स्वदेशी ,पौराणिक सनातनी परंपरा का अनुसरण कर पाश्चात्य संस्कृति का परित्याग करें देश को विश्व गुरु बनाने में अपना अहम योगदान दें।
;> पंडित अवतोष शर्मा स्वतंत्र लेखक