साहित्य

15 अगस्त 1947:- हिंदुस्तानियो के लिए ऐतिहासिक दिन, बड़ी कुर्बानियो के बाद मिली थी खुली सांस

15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से मुक्त होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बना था भारत…

तिरंगा ही आन है…
तिरंगा ही शान है।
तिरंगा ही हम हिंदुस्तानियों की पहचान है।

प्रस्तुुति: तैय्यब अली
स्वतंत्र लेखक एव इतिहास संकलनकर्ता (बिजनौर) हमारा मुल्क इस वर्ष आजादी की 75वां वर्षगांठ मनाने जा रहा है। भौगोलिक, धार्मिक व सांस्कृतिक विविधता वाला यह देश आजादी के 75 सालों में मोहब्बत व नफरत के कई पड़ाव से होकर गुजरा है। साल 1947 में भारतीयों ने इस दिन ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की थी, यह भारत का राष्ट्रीय त्योहार है। इस दिन भारत ब्रिटिशों के औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो गया था। इस वर्ष 15 अगस्त के उपलक्ष्य में हर घर तिरंगा अभियान चलाया जा रहा है, ताकि लोगों को भारतीय ध्वज फहराने व घर लाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। अगस्त के शुरूआती दिनों से ही स्कूल, कॉलेज से लेकर देश के सरकारी विभागों में तिरंगा यात्रा निकाली जा रही है। साथ ही स्वतंत्रता दिवस के दिन विशेष कार्यक्रम के आयोजन की तैयारियां चल रही हैं। 15 अगस्त 1947 का दिन हमारे देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा गया है। इस शुभ दिन पर हमें सैंकड़ों सालों की दासता से मुक्ति मिली थी। इसलिए यह दिवस राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा। इस अवसर पर सभी स्कूलों, कार्यालयों, कारखानों, संस्थानों में अवकाश होता है। वैसे तो स्वतंत्रता दिवस का जश्न देश के हर इलाके में मनाया जाता है लेकिन भारत सरकार का भव्य और प्रमुख आयोजन दिल्ली के लाल किले पर होता है। इस दिन हर जगह प्यारा तिरंगा शान से अपना मस्तक ऊंचा किए हवा में लहराता दिखता है। इस दिवस पर ऐतिहासिक लाल किले पर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराते हैं। राष्ट्रीय ध्वज को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। राष्ट्रीय गान होता है और लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री वहां कार्यक्रम में बैठे लोगों समेत पूरे देश को संबोधित करते हैं। देश के नाम उनका संदेश हर टीवी चैनल पर दिखाया जाता है। रात के समय सरकारी भवन रोशनी से नहाये होते हैं। दिल्ली के संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट समेत पूरे लुटियन जोन पर लगीं लाइटों का नजारा देखने लायक होता है। दोस्तों, ये दिन हमें उन महान स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग व बलिदान की भी याद दिलाता है जिन्होंने बड़ी बड़ी कर्बानियां देकर भारतमाता की बेड़ियां काटी थीं। आज मैं उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करता हूं जिन्होंने भारत को आजाद कराने का सपना देखा और जिन्होंने खुद के प्राण न्यौछावर कर दिए ताकि हम एक स्वतंत्रत भारत में सांस ले सकें। इस अवसर पर जगह-जगह वाद विवाद एवं संस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। देश की तरक्की, आजादी के बाद क्या खोया , क्या पाया, राष्ट्र के समक्ष समस्याएं, भविष्य की चुनौतियों पर मंथन होता है। साथियों इस दिन में राष्ट्र निर्माण, देश के विकास व रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। हमें गांधीजी के सत्य व अहिंसा के सिद्धांतों को जीवन में उतारना चाहिए। भारतीय संविधान में लिखीं बातों का पालन करें, यही देश का सम्मान है। स्वतंत्रता दिवस के इस पावन पर्व की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं।

जय हिंद, जय भारत।


आईये जानते है स्वतंत्र लेखक एवं इतिहास संकलनकर्ता तैय्यब अली से कैसे स्वतंत्र राष्ट, के पथ पर अग्रसर होता गया भारत…………..

यूरोपीय व्यापारियों ने 17वीं सदी से ही भारतीय उपमहाद्वीप में पैर जमाना आरम्भ कर दिया था। अपनी सैन्य शक्ति में बढ़ोतरी करते हुए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 18वीं सदी के अन्त तक स्थानीय राज्यों को अपने वशीभूत करके अपने आप को स्थापित कर लिया था। 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत सरकार अधिनियम 1858 के अनुसार भारत पर सीधा आधिपत्य ब्रितानी ताज (ब्रिटिश क्राउन) अर्थात ब्रिटेन की राजशाही का हो गया। दशकों बाद नागरिक समाज ने धीरे-धीरे अपना विकास किया और इसके परिणामस्वरूप 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई० एन० सी०) निर्माण हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद का समय ब्रितानी सुधारों के काल के रूप में जाना जाता है जिसमें मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार गिना जाता है लेकिन इसे भी रोलेट एक्ट की तरह दबाने वाले अधिनियम के रूप में देखा जाता है जिसके कारण स्वरुप भारतीय समाज सुधारकों द्वारा स्वशासन का आवाहन किया गया। इसके परिणामस्वरूप महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों तथा राष्ट्रव्यापी अहिंसक आंदोलनों की शुरूआत हो गयी। 1930 के दशक के दौरान ब्रितानी कानूनों में धीरे-धीरे सुधार जारी रहे; परिणामी चुनावों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। अगला दशक काफी राजनीतिक उथल पुथल वाला रहा: द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की सहभागिता, कांग्रेस द्वारा असहयोग का अन्तिम फैसला और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा मुस्लिम राष्ट्रवाद का उदय। 1947 में स्वतंत्रता के समय तक राजनीतिक तनाव बढ़ता गया। इस उपमहाद्वीप के आनन्दोत्सव का अंत भारत और पाकिस्तान के विभाजन के रूप में हुआ। लाखों मुस्लिम, सिख और हिन्दू शरणार्थियों ने स्वतंत्रता के बाद तैयार नयी सीमाओं को पैदल पार कर सफर तय किया। पंजाब जहाँ सीमाओं ने सिख क्षेत्रों को दो हिस्सों में विभाजित किया, वहां बड़े पैमाने पर रक्तपात हुआ, बंगाल व बिहार में भी हिंसा भड़क गयी पर महात्मा गांधी की उपस्थिति ने सांप्रदायिक हिंसा को कम किया। नई सीमाओं के दोनों ओर 2 लाख 50 हजार से 10 लाख लोग हिंसा में मारे गए। पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, वहीं, गांधी जी नरसंहार को रोकने की कोशिश में कलकत्ता में रुक गए,पर 14 अगस्त 1947, को पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस घोषित हुआ और पाकिस्तान नामक नया देश अस्तित्व में आया; मुहम्मद अली जिन्ना ने कराची में पहले गवर्नर जनरल के रूप में शपथ ली। भारत की संविधान सभा ने नई दिल्ली में संविधान हॉल में 14 अगस्त को 11 बजे अपने पांचवें सत्र की बैठक की। सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने की। इस सत्र में जवाहर लाल नेहरू ने भारत की आजादी की घोषणा करते हुए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी नामक भाषण दिया। सभा के सदस्यों ने औपचारिक रूप से देश की सेवा करने की शपथ ली। महिलाओं के एक समूह ने भारत की महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया व औपचारिक रूप से विधानसभा को राष्ट्रीय ध्वज भेंट किया। आधिकारिक समारोह नई दिल्ली में हुए जिसके बाद भारत एक स्वतंत्र देश बन गया। नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पद ग्रहण किया, और वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने पहले गवर्नर जनरल के रूप में अपना पदभार संभाला। महात्मा गांधी के नाम के साथ लोगों ने इस अवसर को मनाया। गांधी ने हालांकि खुद आधिकारिक घटनाओं में कोई हिस्सा नहीं लिया। इसके बजाय, उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच शांति को प्रोत्साहित करने के लिए कलकत्ता में एक भीड़ से बात की, उस दौरान ये 24 घंटे उपवास पर रहे। 15 अगस्त 1947 को सुबह 11:00 बजे संघटक सभा ने भारत की स्वतंत्रता का समारोह आरंभ किया, जिसमें अधिकारों का हस्तांतरण किया गया। जैसे ही मध्यरात्रि की घड़ी आई भारत ने अपनी स्वतंत्रता हासिल की और एक स्वतंत्र राष्ट्र बन गया।

 

लेखक के अपने विचार है। संपादक मंडल का सहमत होना आवश्यक नही।

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