25 वर्ष फरारी काटी, धर्म बदला.. अब पकड़ा गया बालक का क़ातिल सलीम वास्तिक

13 वर्ष के बालक का क़ातिल निकला एक्स मुस्लिम सलीम, जेल से बचने को धर्म छोड़ा.. पहचान छिपाई.. मगर अब कानून से बच न पाया.. पुलिस ने पकड़ा और भेज दिया जेल

(इरशाद राव)
UP के गाज़ियाबाद से पुलिस ने खुद को एक्स मुस्लिम बताने वाले सलीम वास्तिक को 13 वर्ष के बच्चे का किडनेप कर हत्या के मामले में भगोड़ा होने पर अरेस्ट किया है।
शामली के मूल निवासी सलीम ने 1995 में कारोबारी के बेटे संदीप बंसल को किडनेप किया था। फिरौती न मिलने पर हत्या कर दी थीं। 1997 में उसे उम्र कैद हुई। वर्ष 2000 में ज़मानत के बाद वह लापता हो गया। अब हमले के बाद वह अपने घर पर UP पुलिस के 2 जवानो की सुरक्षा में मिला। जो पुलिस द्वारा उसे जान के खतरे के मद्देनजर मिली थीं। यह मामला भी इसी सुरक्षा में तैनात पुलिस के जवानो की वजह से ही खुल पाना माना जा रहा है।

जेल से बचने को धर्म – पहचान बदली….

फरारी काटने के दौरान उसे आईडिया मिला की यदि वह अपना धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म के खिलाफ जहर उगलेगा तो वह बचा रहेगा? ऐसा ही किया.. उसने सोशल मीडिया पर मुस्लिम धर्म को निशाने पर रखा। नतीजा यह हुआ की वह फेमस हो गया.. सोशल मीडिया से उसकी कमाई भी होने लगी।

हमले के बाद चर्चा में आया….

27 फरवरी को उस पर जीशान व गुलफाम नाम के 2 सगे भाईयो ने ब्लैड से हमला किया। UP पुलिस ने दोनों हमलावरो को एनकाउंटर में मार गिराया था। अब वह अस्पताल से स्वस्थ होकर लौटा तो राज़ खुल गया। पता चला की वह क़ातिल है.. जेल से बचने को उसने एक्स मुस्लिम का चोला ओढ़ा था।

तीन दशक… 31 साल… और आखिरकार कानून ने हिसाब बराबर कर दिया।
गाजियाबाद के लोनी में वो शख्स पकड़ा गया, जिसने 1995 में 13 साल के मासूम को अगवा कर लिया था। 30 हजार की फिरौती मांगी… लेकिन पैसे आने से पहले ही बच्चे की जान ले ली। एक परिवार उजड़ा — और एक अपराधी ने भागकर नई ज़िंदगी बना ली।
सजा हुई — उम्रकैद।
जमानत मिली — और वहीं से खेल शुरू।
नाम बदला… चेहरा बदला… शहर बदले… यहां तक कि खुद को “मरा हुआ” तक घोषित करवा दिया। कानून को गुमराह करता रहा, साल दर साल।
2011 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी राहत नहीं दी, लेकिन वो फिर भी बचता रहा।
सोशल मीडिया पर नया किरदार — “एक्स-मुस्लिम यूट्यूबर”।
बाहर से नई पहचान… अंदर वही पुराना गुनाह।
लेकिन सच छुपता नहीं… बस वक्त लेता है।
लोनी में जाल बिछा… और 31 साल की भागमभाग खत्म।
अब वही अदालत… वही कानून… और वही सजा उसका इंतज़ार कर रही है।

31 साल की फरारी का पूरा खेल

यह सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं, बल्कि भागते हुए जीवन, झूठी पहचान और लगातार डर में जीने की कहानी भी है।
🔻 1. “मौत का नाटक” — सबसे बड़ा छल
फरारी के बाद आरोपी ने सबसे चौंकाने वाला कदम उठाया—
👉 खुद को मृत घोषित करवा दिया
इसका मकसद साफ था:
पुलिस की फाइलों में “खत्म” दिखना
तलाश धीमी पड़ना
नया जीवन शुरू करने का मौका मिलना
लेकिन कागज़ों में मरना आसान है… हकीकत में अतीत नहीं मरता।
🔻 2. नई पहचान, नया नाम
“सलीम वास्तिक” से “सलीम अहमद” बन गया
अलग-अलग शहरों में किराये पर रहना
पहचान छुपाने के लिए सीमित लोगों से संपर्क
👉 एक जगह टिकना मतलब खतरा… इसलिए लगातार ठिकाने बदलना उसकी मजबूरी बन गई।
🔻 3. हर कदम पर डर
31 साल की फरारी कोई फिल्मी कहानी नहीं होती—
हर दस्तक पर शक
हर नए चेहरे से डर
पुलिस का खौफ हमेशा दिमाग में
👉 बाहर से आम आदमी… अंदर से हर पल भगोड़ा।
🔻 4. डिजिटल दुनिया में नई एंट्री
समय बदला तो उसने तरीका भी बदला—
सोशल मीडिया पर “एक्स-मुस्लिम यूट्यूबर” के रूप में एक्टिव हुआ
वीडियो बनाकर अपनी नई पहचान बनाई
फॉलोअर्स के बीच अलग छवि गढ़ी
👉 लेकिन यही कदम उसके लिए सबसे बड़ी चूक साबित हुआ।
🔻 5. कानून की वापसी
टेक्नोलॉजी और सर्विलांस ने पुराने केस को फिर जिंदा किया
डिजिटल एक्टिविटी से सुराग मिलने लगे
लोकेशन ट्रैक होकर गाजियाबाद के लोनी तक पहुंच गई
👉 31 साल की चालाकी… एक लोकेशन ने खत्म कर दी।
🔻 6. गिरफ्तारी — अंत नहीं, हिसाब की शुरुआत
ARSC टीम ने जाल बिछाकर दबोचा

अब पूछताछ में पूरे नेटवर्क और फरारी के राज खुलेंगे
पुरानी सजा फिर से सामने खड़ी है।

गाजियाबाद के लोनी से 31 वर्ष बाद हुई इस गिरफ्तारी ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि गंभीर आपराधिक मामलों में कानून की प्रक्रिया भले लंबी हो, लेकिन अंततः न्याय की दिशा में आगे बढ़ती है। वर्ष 1995 के इस मामले में आरोपी द्वारा पहचान बदलना, ठिकाने बदलना और खुद को मृत घोषित करवाना जैसे प्रयास किए गए, फिर भी वह कानून की पकड़ से स्थायी रूप से नहीं बच सका।
इस घटनाक्रम से यह भी सामने आता है कि समय के साथ जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और तकनीकी साधनों में हुए बदलाव पुराने मामलों के खुलासे में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लंबे समय से लंबित मामलों में भी नई सूचनाओं और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर कार्रवाई संभव हो रही है।
साथ ही, यह मामला पीड़ित परिवारों के लिए भी एक संदेश है कि न्याय प्रक्रिया भले धीमी हो, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं होती। गंभीर अपराधों में न्याय की उम्मीद लंबे समय तक बनी रह सकती है।
पुलिस द्वारा की गई इस कार्रवाई को लंबित मामलों के निस्तारण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आरोपी को अदालत में पेश कर आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।