साहित्यिक मंच

बहुत थक गई अब मुझे भी घर के कामों से छुट्टी चाहिए..

बहुत थक गई अब
मुझे भी घर के
कामों से छुट्टी चाहिए..
मुझे भी एक
छुट्टी चाहिए
साल में बस
एक दो बार चाहिए..
खो रही हूँ
अपने ही भीतर
कहीं मैं
ख़ुद के साथ घण्टे
दो चार घण्टे चाहिए
मुझे भी एक
छुट्टी चाहिए..
सुबह उठते ही
सरपट दौड़ती
रोज़ की सुबह नहीं,
एक दिन मीठी सी
सुबह चाहिए…
रसोई की चिंता
यूँ तो कभी जाती नहीं,
पर एक दिन
मुझे भी छुट्टी चाहिए…
मुझे भी एक
छुट्टी चाहिए..
न कपड़े न बर्तन
न झाड़ू न पोछा,
न पानी का मटका,
मुझे भी एक
छुटटी चाहिए…
एक दिन इनकी न हो
कोई फ़िक्र मुझे,
एक कप गर्म काॅफी
बिस्तर पर चाहिए..
मुझे भी एक
छुट्टी चाहिए..
सब बैठें हों जब साथ
मैं रसोईघर में न रहूँ,
वो बातें वो ठहाके
जो छूट गए थे कभी,
वो सब एक दिन के
लिए लौटा दो मुझे
आधी हँसी नहीं
खिलखिलाती हँसी
चाहिए..
मुझे भी एक
छुट्टी चाहिए…
घर के हर कोने में
बसती है जान मेरी,
मुझे प्यारी बहुत है
ये दुनिया मेरी,
शिकायत नहीं है
ये है ख़्वाहिश मेरी,
एक दिन मुझे भी
थोड़ा आराम चाहिए..
मुझे भी एक
छुट्टी चाहिए..


सरिता जैन
मुरैना

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