चाचा-भतीजे की जुगलबंदी से किसान आंदोलन को मिली नई धार

Gulshad ahmad
मुजफ्फरनगर।
किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद भारत में किसान राजनीति लगभग हाशिए पर आ गई थी। कोई भी किसान संगठन बड़ा आंदोलन नही कर पा रहा था और न ही किसान आंदोलनो में किसान एकजुट हो पा रहे थे।पिछले काफी समय से किसान संगठन अपनी ढपली अपना राग वाली नीति पर काम कर रहे थे। कुछ नेताओं ने धर्म और जाति के नाम पर बांटने का ऐसा कार्य किया, जिससे भारतीयों में एक अलग ही सोच विकसित होने लगी। लोग रोजी-रोटी छोड़कर हिंदू मुस्लिम धुर्विकरण में जुट गए। इसी का कारण लोगों को नोटबंदी दिखी और न हीं जीएसटी । जिस गैस के सिलेंडर, पेट्रोल,डीजल के महंगा होने पर यही भाजपा के वर्तमान मंत्री थाली पपीटते नहीं थकते थे.अब इसे देश की आवश्यकता बताते नहीं थकते।केंद्र के इन मंत्रियों का अब कहना है कि पेट्रोल,डीजल और गैस की सब्सिडी का देश के विकास में बहुत बड़ा हाथ है। केंद्र सरकार ने गैस सिलेंडर की सब्सिडी को बिल्कुल खत्म कर दिया है।अब जब केंद्र सरकार ने भारत की बड़ी आबादी जिसे हम किसान के रूप में जानते हैं के मामलों में दखल शुरूआत की,पहले तो ये किसान कुछ समझ नहीं पाए ,लेकिन जब यह समझे तो इन्होंने केंद्र द्वारा लाए गए कानूनों का विरोध शुरू किया। इस मुद्दे को किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के छोटे बेटे राकेश टिकैत एवं किसान मसीहा के लाडले पोते गौरव टिकैत ने समझा और इस कानून के विरोध के लिए देश के अनेक हिस्सों में पंचायतें की। इन पंचायतों का नतीजा यह हुआ कि भारत के अनेक किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन के झंडे के नीचे एकत्रित होकर आज भारत की इस बेरहम केंद्र सरकार की नींद हराम किए हुए हैं। आज राकेश टिकैत और गौरव टिकैत का नाम किसान राजनीति की बुलंदियों में है। चाचा भतीजे की यह जुगलबंदी भारत में ही नहीं दुनिया के 30- 40 देशों में चर्चा का विषय बनी हुई है। भाकियू प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत जहां देश के अनेक हिस्सों में भ्रमण कर किसान आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने हैं तो ऐसे समय में युवा नेता गौरव टिकैत दिल्ली बॉर्डर पर मोर्चा लिए मौजूद रहते हैं, और जब गौरव टिकैत देश के किसी हिस्से में समर्थन के लिए जाते हैं ऐसे में राकेश टिकैत दिल्ली बॉर्डर पर मोर्चा लिए मौजूद रहते हैं।इस दौरान भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत कम ही नजर आते हैं ।वह किसानों की हौसला अफजाई के लिए हर तीसरे या चौथे दिन किसानों के बीच में उपस्थित रहते हैं।

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